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Monday, October 3, 2022

रक्तरंजित साम्यवाद एक धूर्त विचार

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Dhananjay Gangey
Dhananjay gangey
Journalist, Thinker, Motivational speaker, Writer, Astrologer🚩🚩
पढने में समय: 5 मिनट

संरचनात्मक समानता को लेकर वर्ग संघर्ष एक वर्ग विहीन व राज्यविहीन विचार है। समाजवाद से यह वर्गसंघर्ष अर्थात हिंसा के मामले में भिन्न है।

समाजवाद समानता और शोषण विहीन समाज की संरचना का विचार देता है और रक्तरहित क्रांति की बात करता है। साम्यवाद उससे आगे बढ़कर वर्ग संघर्ष और रक्त सहित क्रांति और बुर्जवा वर्ग की तानाशाही की बात करता है। यह विचार किताबों में बहुत मजबूत और सुंदर है। वहीं तृणमूल स्तर पर व्यक्ति की तानाशाही, असीम शक्ति के उपभोग करने की छूट देता।

इसीने लेनिन, स्टॅलिन, वे चिगरा, माओत्से तुंग को जन्म दिया। जिन्होंने शोषणविहीन समाज की बात करके लोगों के अधिकार को सत्ता में समाहित कर लिया। क्रूरतम हत्याकांड को अंजाम दिया। इनकी स्वयं की सेना इनके व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए इनके विरोधियों का कत्लेआम करती है।

कम्युनिस्ट मैनोफेस्टो जिसको कार्ल मार्क्स और फेड्रिक एंजल ने लिखा था। इसे बुर्जवा वर्ग का बाइबिल कहा जाता है। सबसे महत्वपूर्ण देखने वाली बात यह है कि जब विचार को धरातल पर लागू किया गया उससे आमलोगों को कितना लाभ पहुँचा?

आमतौर पर देखा गया है कि कम्युनिस्ट शासक में सनक भरी रहती है। जैसे स्टालिन और माओ किसी विदेशी राजदूत या विदेश मंत्री से मिलने से पहले उसकी टट्टी तक चेक करवा करके यह देखते थे वह किसप्रकार सोचता है।

माइकल ओवन का समाजवाद और कार्ल मार्क्स का साम्यवादी विचार उनके अपने मदरलैंड इंग्लैंड और जर्मनी में ही नहीं चल पाया किन्तु विश्व भर में अपने पांव पसारे। कार्ल मार्क्स के विचार को राजनैतिक और सामाजिक धरातल पर सबसे पहले सोवियत यूनियन में लेनिन द्वारा उतारा गया।

इसे मार्क्सवादी-लेनिनवाद कहा गया जिसमें रक्तरंजित क्रांति का सहारा लेकर सत्ता की प्राप्ति हुई।
समाज को सैनिक के अधीन करके सरकारी पूँजीवाद को बढ़ावा दिया गया।

चीन में मार्क्सवाद को नया आकर माओ मार्क्सवादी-माओवाद को विकसित किया गया। जिसमें

सत्ता बंदूक की नली से निकलती है, मार्क्सवाद का राष्ट्रीय चीनी संस्करण किया गया।

माओ की नीतियां औद्योगिकण को लेकर भारी पूँजीनिवेश आधारित थी जिस पूँजीवाद का मार्क्स ने विरोध किया उसे ही लेनिन, स्टालिन और माओ ने स्वीकार कर लिया।

भारत में साम्यवाद को राजनैतिक रूप में की स्थापित करने का श्रेय एम एन राय (मानवेन्द्र नाथ राय) को है जिन्होंने कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की स्थापना की थी। राजनैतिक पार्टी के रूप सत्यभक्त ने 1925 ई. में भारतीय साम्यवादी पार्टी की स्थापना कानपुर में की थी। यह 1942 के पूर्व तक साम्यवादी और समाजवादी कांग्रेस के बैनर तले काम किया करते थे।

नीतिगत स्तर पर देखे तो एक चीज बिल्कुल स्पष्ट होती हैं जब शोषण मुक्त, समानता आधारित समाज निर्माण की संरचना को लेकर यदि कार्य करना था उसके लिए हमारे पास विकसित चिंतन रहा है जिसके सबसे बड़े पुरोधा थे कबीर बाबा। वह कहते भी हैं कि

न कुछ देखा राम नाम में
न कुछ देखा पोथी में।
कहत कबीर सुनउ भाई साधु
सब कुछ देखा रोटी में।।

साई इतना दीजिये जामे कुटुंब समाय।
मैं भी भूखा न रहू साधु भूखा न जाय।।

भारत के लम्पट कम्युनिस्ट का ध्यान कभी कबीर की शिक्षा की ओर नहीं गया क्योंकि बड़ी विदेशी दुकान के चक्कर में भारत की बौद्धिकता को मैकालयी मानस खा गयी।

भारत छोड़ो आंदोलन में ये लोग कांग्रेस का साथ न देकर अंग्रेजों के साथ खड़े हो गए। जबकि पहले ये जर्मनी के साथ थे क्योंकि स्टालिन और हिटलर में संधि थी। जब हिटलर ने सोवियत संघ पर हमला कर दिया तो सोवियत संघ मित्र राष्ट्र के खेमे में चला गया तब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सरकार का सहयोग करने लगी।

यही स्थिति 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय उत्पन्न हुई। जब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी चीन के समर्थन में सेना बनाने का काम करने लगी।

इसी को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन होगया। CPI कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया बनी। पुराना धड़ा सी.पी.एम. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ माओवादी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। माओवादियों ने जनतंत्र में सत्ता के लिए लोकतंत्र में आस्था व्यक्त कर दी। वहीं दूसरा रूप अधिकारों के लिए 1967 से नक्सलबाड़ी से हथियार उठा लिया जिसका कोई स्थान भारतीय समाज में नहीं है।

कम्युनिस्ट के लिए यह आम राय है किसी की भी आलोचना कर सकते है पर साथ किसी का नहीं देंगे अर्थात मित्र किसी के नहीं रह सकते।

इक्के-दुक्के देशों को छोड़कर पूरे विश्व में साम्यवाद मर रहा है लेकिन रूस-चीन में बारिश होने पर भी भारत के कम्युनिस्ट छतरी यहाँ तानते है।

विश्व के मजदूर एक हो सर्वहारा क्रांति करें सत्ता पर अधिकार जमा लें…. आगे ही उसी सत्ता का प्रयोग सर्वहारा लोगों की आवाज, अधिकार जमाने को कहता है।

यह मजदूरों को आगे करके सत्ता की चोरी कर लेता है।

मार्क्स ईसाई धर्म को जनता के लिए अफीम कहा है। किंतु जब उसका विचार लोगों में फैला तो वह स्वयं अफीम बन गया। स्टॅलिन एक गरीब परिवार से सत्ता की सीढ़ी चढ़ने के बाद राजा बन गया। अपने प्रतिद्वंद्वी और विरोध का स्वर ऊँचा करने वाले को यत्र-तत्र मौत के घाट उतरा दिया। उसके समय में सोवियत संघ में लाखों लोग मारे गये।

स्टालिन का काम ही माओ ने चीन में किया जो बदस्तूर आज भी जारी है। कौन भूल सकता झियांन झेमिन के समय थ्येनमेन चौक की बर्बरता को, जब लोकतंत्र समर्थको की आवाज को तोपों व बंदूकों की गड़गड़ाहट से रौंद दिया गया। बमुश्किल कोई बच पाया।

कार्ल मार्क्स स्वयं लम्पट था अपने मित्र एंजेल की बीबी लेकर भाग खड़ा हुआ। यह ऐसी विचार धारा है जो लोगों के नहीं बल्कि नेताओं के हित संवर्द्धन करती है। यह पूँजीवाद का विरोध करके व्यवहार में पूँजीवाद की ही स्थापना करती है।

नैतिकता से कोसों दूर चारित्र की जगह शारीरिक सुख को केंद्र में रखती है। भारत के कम्युनिस्ट कन्फ्यूज हैं कि उन्हें किस रास्ते पर चलना है।

लोकतांत्रिक प्रणाली में जबरदस्त हिंसक घटनाओं का सहारा लिया जाता है। इसका ज्वलंत उदाहरण पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल रहे हैं जहां चुनाव के समय व्यापक हिंसा देखने को मिलती है।

सबसे बड़ी बात जो देखने को मिलती है वो यह कि जिस गली क्षेत्र में एक पार्टी का बोर्ड लगा है यदि दूसरी पार्टी वहाँ चुनाव प्रचार के लिए चली जाय तो निश्चित है हिंसा होगी आम आदमी मारा जायेगा।
कम्युनिस्ट विचार धारा कहती है कामरेड मरते हैं तो मरें लेकिन लाल सलाम अमर रहे। उसके नेता सत्ता सुख भोगे और कार्यकर्ता दलाली कार्यक्रम चलाये।

कम्युनिस्ट मुस्लिम वोट बैंक के लिए सेकुलर बन जाता है। नमाज, मस्जिद, जाली टोप को अपना लेता है। भारत में कलकत्ता और कानपुर के उद्योगों को उजाड़ने का काम इनके मजदूर यूनियन का है।

हो सकता है यह विचार पुस्तकों में अच्छा हो किन्तु व्यवहार में यह तानाशाही शासन एवं जनाकांक्षाओं की जगह यह व्यक्तिगत इच्छा से संचालित होता है जिसमें व्यक्तिगत अधिकार, मानवीय गरिमा स्वतंत्रता को शासन के अधीन कर उसकी आवाज को मौन कर दिया जाता है।
भारत जैसे सांस्कृतिक विरासत वाले देश में राजनैतिक चिंतन की कमी नहीं रही है। उपनिषद, स्मृतियां, रामायण, महाभारत, अर्थशास्त्र जैसे महान ग्रंथ रहे हैं जो कहते हैं ‘प्रजा सूखे सुखं राजन’ अर्थात जनता के सुख में ही राजा का सुख है। लेकिन अंधी नकल और झूठे विकास के नाम पर आज भारतीय गंगा को छोड़ के विदेशी नाले में खूब छलांग लगा रहे हैं।


नोट: प्रस्तुत लेख, लेखक के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो।

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