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Thursday, April 15, 2021
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    पश्चिम बंगाल में किसकी सरकार?

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    Satyendra Tiwari
    Satyendra Tiwari
    न कविवर हूँ न शायर हूँ। बस थोड़ा-बहुत लिखा करता हूँ। मन में आए भावों को, कभी गद्य तो कभी पद्य में व्यक्त किया करता हूँ।
    पढने में समय: 9 मिनट

    पश्चिम बंगाल में किसकी सरकार? किसकी सरकार, कितने सीटों से और क्यों बनेगा?

    पूरा विश्लेषण :

    पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव 2021, जो कुल 294 सीटों के लिए आठ चरणों में सम्पन्न होना है। जिसका अभी तक दो चरण सम्पन्न हो चुका है। जैसा कि विदित है कि इस चुनाव का मुख्य आकर्षण नंदीग्राम का सीट, जहाँ से भाजपा के उम्मीदवार शिवेन्दु अधिकारी (TMC के बागी, जो भाजपा में शामिल होने से पहले ममता बनर्जी के दाहिना हाथ माने जाते थे।) का सीधा टक्कर TMC नेता स्वयं ममता बनर्जी, वर्तमान मुख्यमंत्री से द्वितीय चरण में ही सम्पन्न हो चुका है। 

    यूँ तो तीन पार्टियां या पार्टियों का ग्रुप चुनाव मैदान में है। लेकिन मुख्य मुकाबला TMC यानि तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में है। तीसरी पार्टी के रूप में कांग्रेस लेफ्ट के साथ मिलकर अपनी लाज बचाने यानि जनता को यह जतलाने के लिए चुनाव लड़ रही है। ताकि लोग यह कह सके कि बंगाल में कांग्रेस या लेफ्ट अभी जिंदा है। दो चरण के मतदान सम्पन्न भी हो गया लेकिन अभी तक कांग्रेस के तीनों महान हस्ती जहाँ से कांग्रेस पार्टी की हर एक गतिविधियां शुरू होती है और इनमें ही आकर खत्म भी हो जाती है। यानि कांग्रेस लिमिटेड कंपनी के तीन शीर्षस्थ CEO राहुल गाँधी, सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा अभी तक बंगाल पहुंचे हैं। जबकि दो चरण का मतदान सम्पन्न हो गया है।

    अब सवाल उठता है कि जीत किसकी होगी?

    पब्लिक है, सब जानती है। उसे अच्छी तरह से पता है कि उसे मुख्य दो दलों तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में से ही किसी एक को ही चुनना है।  

    चुनाव पूर्व बहुत पहले से ही अलग अलग एजेंसियों द्वारा ओपिनियन पोल आने का सिलसिला शुरू हो गया था। मतदान समाप्त होने के बाद ही फटाफट एक्जिट पोल भी आ जाएगा। लेकिन उससे पहले मेरा आकलन यह है कि भाजपा की स्पष्ट बहुमत की सरकार बनने जा रही है। भाजपा को कितना सीट मिलेगा। इसकी चर्चा आगे किया गया है। 

    भाजपा को बहुमत क्यों मिलेगा? 

    👉 पहला कारण यह है कि पश्चिम बंगाल के हिन्दू देश के बाकी भागों में बसे हिन्दुओं की सोच से अलग सोच रखते हैं।

    देश के बाकी भागों में बसे हिन्दुओं में से बहुत लोग मोदी युग के पीएम काल से पहले तक सैक्युलरिजम का अर्थ हिन्दू धर्म को राजनीति में अछुत मानते थे। इन भागों में आज भी कई हिन्दू ऐसे हैं जो जन्म से सैक्युलर हो जाते हैं। ये लोग सनातन धर्म को छोड़ कर बाकी धर्म की बात बेहिचक करते हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं है। वे एक दिन कांग्रेस के उपरांत बामपंथियों के सबसे बड़े समर्थक रहे हैं। जबकि सबको पता है कि बामपंथी हिन्दू धर्म के बारे में कैसा सोच रखते हैं। आजादी के तुरंत बाद मुस्लिम लीग सारे के सारे पाकिस्तान नहीं चले गए। जिस प्रकार बाढ़ आती है और उसके जाने के बाद भी गढ्ढे में पानी रह जाता है और बड़े बड़े गढ्ढों में ज्यादा पानी भी रह जाता है। ठीक ऐसे ही कुछ मुस्लिम लीगी बामपंथ के रूप में जो आजादी के पहले से भी थे। बामपंथ के रूप में हमारे देश में भी फलने फूलने लगे।

    यहाँ मेरा यह कहना है कि जो हिन्दू बामपंथियों का समर्थन करके लगातार 35 वर्ष सत्ता में बनाए रखा। वही लोग बाद में अटल बिहारी वाजपेयी युग में भाजपा का राष्ट्रीय राजनीति में सबसे मुखर पार्टी के रूप में आने के बाद भी बंगाल में टस से मस नहीं हुए। 2011 में भी जब ममता बनर्जी ने बामपंथ के किले को ध्वस्त किया तो भी तथाकथित हिन्दू समर्थक भाजपा का यहाँ नामोनिशान नहीं था। 2014 में भी मोदी काल में जहाँ पूरे भारत में भाजपा का डंका बज रहा था। वहाँ बंगाल में हर तरफ TMC का डंका बजा। यही कारण था कि 2016 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा को मात्र 03 सीट पर जीत से ही संतोष करना पड़ा। 

    पश्चिम बंगाल के हिन्दू मुद्दों के आधार पर किसी पार्टी को सर आंखों पर बिठाते हैं। न कि भावना के आधार पर। लेकिन अब इस मोदी युग में वह परिवर्तन के लिए आतुर हैं। इसका कारण यह है कि ममता बनर्जी के पहले लेफ्ट के शासन काल से अबतक हिन्दू धर्मावलंबियों ने तुष्टिकरण की राजनीति देखा। जिसे ममता बनर्जी से जो उम्मीद थी। उस पर पानी फिरता नजर आया। बल्कि ममता बनर्जी ने खुलकर हिन्दुओं का विरोध और मुसलमानों को सर पर बिठाने का काम शुरू कर दिया। जहाँ दुर्गा पूजा सरस्वती पूजा में हिन्दुओं को हाईकोर्ट से अनुमति लेने की जरूरत पड़ने लगी। वहाँ मुसलमानों को ममता बनर्जी का खुलकर समर्थन मिलने लगा। उन्हें बिना रोकटोक अपने जलसे जूलूस आदि निकालने दिया जाता रहा। इसके अलावा उन्हें ममता बनर्जी से जिस विकास की दरकार थी। वह भी पूरा नहीं हो पाया। बीते दस वर्षों में वह ठगा महसूस करने लगा। अब वो किसी को 35-35 वर्ष देने के मूड में नहीं हैं। 

    हिन्दू तंग आकर अब ममता बनर्जी की सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकने को उतावले हो चुकें हैं। यहाँ के हिन्दुओं में जन्मजात सैक्युलरिजम नहीं है। इन्होंने कांग्रेस को देखा, लेफ्ट को देखा, ममता बनर्जी को देखा, अब अंतिम में उनकी सारी आकांक्षाएँ भाजपा पर आ टिकी है। 

    👉 दूसरा कारण भाजपा की रणनीति। 

    भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले से ही अपनी पैठ मजबूत करने में जुटी हुई थी। वह हिन्दुओं को यूनाइट होकर भाजपा के पक्ष में वोट करने के लिए माहौल तैयार कर दिया था। जिसकी फसल 2019 के लोकसभा चुनाव में 42 में 18 सीटें जीतकर काट लिया। जहाँ TMC को 43 फीसद वोट मिले वहाँ भाजपा ने 40 फीसद वोट लेने में कामयाबी दर्ज करा दिया। अगर इसके हिसाब से आकलन किया जाए तो भाजपा ने विधानसभा के कुल 294 सीटों में से 121 पर और TMC ने 164 सीटों पर बढत बनाए हुए थी। लेकिन तब और आज में राजनीतिक माहौल में काफी अंतर आ चुका है। भाजपा लोकसभा चुनाव में 18 सीटों पर जीत दर्ज करने के बाद अतिउत्साह में अपनी आखिरी मंजिल को प्राप्त करने का लक्ष्य तय कर दिया और इस पर सतही तौर पर काम भी करना शुरू कर दिया। यह आखिरी मंजिल पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव को जीतना था। 

    इस मौजूदा चुनाव में भाजपा ने बहुत दिनों पहले से ही अपने शीर्ष नेतृत्व द्वारा ऐसी आक्रामक शैली अख्तियार किया। ऐसी बिसात बिछा दिया कि हिन्दुओं को पोलराइ्ज होकर वोट करने में सिर्फ सफलता ही नहीं पाई, बल्कि ममता बनर्जी को भी अपने इशारों पर रणनीति सेट करने पर मजबूर कर दिया। ऐसा जाल बिछा दिया कि ममता बनर्जी को अपने स्वभाव के विपरीत हिन्दुओं के पक्ष में तुष्टिकरण पर मजबूर कर दिया। लेकिन स्वभाव तो स्वभाव होता है। वह गाहे ब गाहे तो अनायास ही प्रकट तो हो ही जाता है। उन्हें जय श्री राम के नारे पर उन्हें जितना गुस्सा आता, भाजपा उन्हें उतना ही उकसाने का काम करने लगी। ममता बनर्जी जहाँ जाती वहाँ भाजपा के लोगों द्वारा जय श्री राम का नारा लगाकर इनके हिन्दू विरोधी रवैये को हर मंच से जगजाहिर करवाने में कामयाब रही। स्वभाव से मजबूर ममता बनर्जी इसका खामियाजा जानते हुए भी अपने आप को न कभी रोक पाई और न अब रोक पा रही है। गुस्से में आगबबूला तुनकमिजाजी ममता बनर्जी का अचानक हिन्दुओं का हिमायती होना इन्हें न घर का न घाट