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Tuesday, October 19, 2021

कर्मयोग – सकाम और निष्काम कर्म

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एक विचार
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स्वतंत्र लेखक, विचारक
पढने में समय: 4 मिनट

प्रायः सम्पूर्ण भारतीय चिंतन-धारा का स्रोत ‘कर्मयोग’ ही है। और यही शाश्वत सत्य भी है। किसी भी विचारधारा का चिंतन, अनुशीलन तथा उसके मूल्यांकन की कसौटी ‘कर्मयोग’ है। यह शब्द जितना सरल और स्वत्वाक्षरी है, उतना ही भाव अर्थ गाम्भीर्ययुक्त है। वैदिक वांग्मय के बाद न केवल भारत- भूखण्ड में बल्कि सम्पूर्ण भूमण्डल में ‘गीता के कर्मयोग’ का नगाड़ा मानवीय कर्तव्य पथ को उद्घोषित कर रहा है तथा यह एक ऐसा प्रयास है जिसके सहारे मनुष्य -जाति विश्व में श्रेष्ठ जीवन-यापन करती आ रही है।

यह सर्वथा स्पष्ट है कि ‘न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्’ (गीता ३/५)- कोई भी प्राणी क्षणमात्र भी बिना कर्म के नहीं रह सकता। ये कर्म कायिक-वाचिक एवं मानसिक (मनसा-वाचा-कर्मणा) तीन प्रकार के हैं। प्रत्येक व्यक्ति प्रतिक्षण कुछ न कुछ करता ही रहता है, चाहे वह जागृत अवस्था में हो या सुषुप्तावस्था में। कर्मरहित होते ही प्राणी निष्प्राण हो जाएगा। ऐसी स्थिति में अब यहां विचारणीय हो जाता है कि कर्म के कितने प्रकार हैं और उसकी क्या प्रक्रिया है आदि।


पढ़ें : कर्म, भाग्य और ज्योतिष


इसमें सबसे पहले ‘सकाम-कर्म’ और ‘निष्काम-कर्म’ ये दो भेद सामने आते हैं। इन दोनों भेदों का संकेत यद्यपि वैदिक काल से ही चला आ रहा है, किंतु ‘गीता’ के प्रमुख प्रतिपाद्य ‘कर्मयोग’ के संदर्भ में यह विषय विशेष विवेच्य के रूप में आया है।

इस पर हजारों गवेषक, मनीषि तत्व-चिंतकों ने चिरन्तनकाल से विभिन्न चिंतन किये हैं और अपने विचार व्यक्त किये हैं। इसपर शास्त्रीय विवेचना भी होती रही है। यह विषय इतना गहन है कि सैद्धांतिक और व्यवहारिक क्षेत्र में विशाल अंतर आ जाता है।

कर्म का प्रेरक उसके फल की इच्छा होती है और गीता उस इच्छा को विष-दंत समझ कर उसे तोड़ देने का आदेश देती है; फिर कर्म किया ही क्यों जाए?

यह कहना जितना सरल है कि ‘फलेच्छा-रहित हो कर कर्म करें’ उतना ही यह व्यवहार में असंभव सा कठिन प्रतीत होता है। यद्यपि यह तो सर्वविदित है कि ‘कर्म करना मात्र’ ही मनुष्य के बस की बात है, फल तो सदा ईश्वराधीन ही है, फिर भी माया का आवरण, अहंकार का जाल तथा मोह की रज्जु इतनी विस्तृत तथा सुदृढ है कि इससे निकल कर वस्तुस्थिति पर आते-आते कोई भी भ्रमित हो जाता है।

व्यवहार में प्रातःकाल उठने से लेकर रात्रि में शयन- पर्यंत कोई भी काम निष्काम नहीं होता है। प्रत्येक कर्म का उद्देश्य होता है। उन्ही उद्देश्यों के सभी विधेय हैं। बुभुक्षा-निवारण के लिए भोजन, स्वास्थ्य एवं मनोरंजन के लिए भौतिक साधनों का संचय – ये सभी सकाम कर्म ही हैं क्योंकि यहां प्रत्येक में फल की कामना है। इसीलिए किसी भी प्रक्रिया में यदि इच्छित फल की प्राप्ति नहीं होती है तो तुरंत उसे बदल कर दूसरी प्रक्रिया अपनाई जाती है।

इन तथ्यों को कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता है। ऐसी स्थिति में निष्काम कर्म कैसे संभव है? उसकी क्या पद्धति है, इत्यादि बड़ी गंभीरता के साथ चिंतनीय हैं। यहां थोड़ी सी गहराई में जाकर देखने से यह ज्ञात होगा कि प्राणिमात्र सदा शांति चाहता है। भीषण-से-भीषण व्यक्ति भी दिन भर हिंसा, हत्या, लूट-पाट करने के बाद भी रात्रि में या अंत में विश्राम या शांति के लिए ही निद्रा की शरण लेता है। वह गहरी नींद का प्रयास करता है और एकांत चाहता है। हिंसक जंतु भी ऐसी ही शांति चाहते हैं। यह शांति सकाम कर्म में नहीं है। कामना की न कोई सीमा है और न उसका कहीं अंत ही है। कामनाएं – फलेच्छाएँ अनंत हैं। जितनी फलप्राप्ति होगी उतनी इच्छा (वासना) बढ़ती जाएगी।

न जातु कामः कामानां उपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ – मनुस्मृति २/९४

फलतः हमें देखना है कि कर्म तो करना ही है, वह करणीय भी है लेकिन उसके परिणाम में अनासक्त रहना है। वहां हमें अपने को तथा अपने कर्मों को जो वास्तविक फलदायक है उस परमशक्ति में समर्पित करना है। यह अनासक्तभाव अत्यंत ही कठिन है। यह क्रमशः अभ्यास से ही होगा। अभ्यास से भावना को एक जगह दृढ़ करना होगा। तब यह क्रिया ‘पद्मपत्रमिवाम्भसा’ (जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी उससे लिप्त नहीं होता वैसे ही कर्म करते हुए भी कर्म-फल में लिप्त नहीं होना।) हो सकेगी।

भावना मानसिक विकार है। मन अत्यंत सीमातीत चंचल है – ‘मनो दुर्निग्रहं चलम्’ (गीता ६/३५)। यह अभ्यास एवं वैराग्य से ही वश में ही सकता है – ‘अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते’ (गीता ६/३५)। बिना अभ्यास के वैराग्य भी सम्भव नहीं है। अतएव कर्म करने के समय उसे निष्ठा, दृढ़ता एवं तत्परता से करने का तो शुभ संकल्प रखना ही है, लेकिन उसी दृढ़ भावना से उन कर्मों के परिणाम पर आसक्ति से मुक्त होना है।

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।। – श्रीमद्भगवद्गीता ६/१

कर्मयोग की सिद्धांत प्रतिपादिका भगवद्गीता इन्ही रहस्यों का उद्घाटन करती है, जिसकी पुनरावृत्ति अनावश्यक है। हम तो सांसारिक-सामाजिक प्राणी हैं, हमें यथार्थ के धरातल पर खड़ा होकर कुछ करना है। यथार्थता से विमुख होकर केवल सैद्धांतिक बातों का उपदेश देना-मात्र पर्याप्त नहीं होगा। इसे जीवन में उतारना होगा। जीवन में उतारने के लिए अभ्यास करना होगा। ‘अभ्यास’ से जीवन में दृढ़ता आएगी। यही दृढ़ता हमें दैहिक एवं भौतिक चकाचौध से विमुख करेगी। तभी हम कर्म करते हुए भी निष्काम भावना से अनासक्त होकर अशांत होने से बचेंगे, जो जीवन का चरम लक्ष्य है। यह ‘निष्काम कर्मयोग’ का मार्ग बड़ा कठिन है, जो सकाम कर्म के रोड़े, ईंट और पीच से बना हुआ ‘राजमार्ग’ है। यह योगियों के परब्रह्म प्रत्यक्षीकरण की तरह अगम्य है, अनिर्वचनीय है। आलंकारियों के साधारणीकरण की तरह चमत्कारिक है। लेकिन है यह अत्यंत आनन्ददायक और भूमण्डल पर जन्म लेने का ‘चर्मोत्कर्षपूर्ण’ परिणाम।

आज विश्व के प्रायः सभी देशों में अवसाद के मरीजों की संख्या में दिनों दिन बढ़ोत्तरी हो रही है। अवसाद का प्रमुख कारण होता है ‘स्व-इच्छा के अनुसार फल की प्राप्ति न होना’ लेकिन यदि परिणाम में ही अनासक्त भाव हो तब? यही कारण है कि मनोचिकित्सक भी मरीजों पर गीता के उपदेशों का प्रयोग कर रहे हैं।

निष्कर्ष यह है कि विश्व के समस्त कर्मों के प्रेषक उनके फल होते हैं। कर्मों में प्रवृत्ति सकाम होती है। मनु जी ने ‘काम्यो हि वेदाधिगमः’ (मनुस्मृति २/२) कह कर काम्य कर्म से ही वेदाध्ययन या वैदिक कर्म का आरंभ बतलाया है। परंतु कामना- फल की इच्छा- बंधनकारक होती है। इससे जीव का परमकल्याण या चरम लक्ष्य सिद्ध नहीं हो सकता। परमकल्याण के लिए नैष्कर्म्य-सिद्धि ज्ञानयोग से विहित होती है किंतु निष्कामता से कर्ममार्ग – कर्मयोग भी निःश्रेयस्कर (कल्याणप्रद) माना गया है। अतः सकाम कर्मों को करते हुए निष्कामता की दिशा में बढ़ना चाहिए, यह काम अभ्यास से और फलों में वैराग्य लाने से क्रमशः साध्य है।


नोट: प्रस्तुत लेख, लेखक के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो।

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नोट: प्रस्तुत लेख, लेखक के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो।
Note: The opinions expressed in this article are the author’s own and do not reflect the view of the संभाषण Team.

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Prabhakar Mishra
Prabhakar Mishra
1 year ago

2009-10 में गीता का स्वाध्याय शुरु किये, 2013 में साधक सञ्जीवनी और गीता माधुर्य का स्वाध्याय किये, 2018 तक सम्पुर्ण भागवतमहापुराण एवं श्रीरामचरितमानस, विनयपत्रिका का स्वाध्याय किये।
साधक सञ्जीवनी में बड़ा सुन्दर एवं आसान भाषा में कर्मयोग,ज्ञानयोग,भक्तियोग और ध्यानयोग, करणनिरपेक्ष और करणसक्षेप साधन शैलियों को समझाया गया है।
साधक सञ्जीवनी में भी कर्मयोग पर विशेष ध्यान दिया गया है। आपका लेख रोचक है।

Prabhakar Mishra
Prabhakar Mishra
1 year ago

साधक सञ्जीवनी में कर्मयोग पर प्रमुखता से प्रकाश डाला गया है, इतना रोमांचकारक वर्णन है साधक सञ्जीवनी में की साधन के विषय में सन्देह रह ही नहीं सकता। हम तो पुनः 2013 में चले गये, कर्मयोग का यह प्रसङ्ग पढ़कर फिर से साधक सञ्जीवनी पुस्तक में ध्यान लग गया। हमारे पास है साधक सञ्जीवनी अब पुनः हम 2013 के तरह एकबार शुरु से अन्त तक साधक सञ्जीवनी का स्वाध्याय करेंगे। बहुत सुन्दर विषय लगा आज… Read more »

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