15.1 C
New Delhi
Monday, January 24, 2022

अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा

spot_img

About Author

Dhananjay Gangay
Dhananjay Gangay
Journalist, Thinker, Motivational speaker, Writer, Astrologer🚩🚩
पढने में समय: 2 मिनट

यूँ तो तालिबान की स्थापना 1994 में हुई थी किन्तु 1980 के बाद से ही तालिबान दक्षिण अफगानिस्तान से शुरू होने लगा था जब अफगानिस्तान पर रूस का प्रभाव था। तब रूस को अफगानिस्तान से खदेड़ने के लिए अमेरिका ने तालिबान की मदद धन और हथियार के रूप में की थी।

इसी आतंवादी संगठन ने 1996 में अफगानिस्तान के अधिकतर प्रान्तों पर कब्जा कर लिया। मुल्ला उमर सुप्रीम कमांडर या सबसे उच्च धार्मिक नेता बन गया। इसी दौर में अमेरिका ने सोवियत संघ को कमजोर करने के लिए चेचिनिया में बिन लादेन की मदद से अल-कायदा का गठन करवाया था।

1990 के बाद सोवियत संघ विघटित हो गया, अमेरिका की चाल कामयाब हो गयी। किन्तु अमेरिका के पाले हुए आतंकवादी संगठन अलकायदा ने वर्ल्डट्रेड सेंटर पर 9/11 को हमला कर अमेरिका को ही चुनौती दे दी। अमेरिका अपने भस्मासुर से बदला लेने अफगानिस्तान आया। मुल्ला उमर और लादेन दोनों मारे गए।

अमेरिका के हथियार बिकें इसके लिए आतंकवाद और युद्ध दोनों की आवश्यकता है। यही मुख्य कारण है अमेरिका का अफगानिस्तान से पीछे हटने का।

जिस तरह अफगानिस्तान पर तालिबान ने कब्जा किया, चुने हुए राष्ट्रपति अशरफ गनी को इस्तीफा देना पड़ा और तालिबानी कमांडर मुल्ला अब्दुल राष्ट्रपति बना है, यह विश्व समुदाय और स्वयं को बड़ी शक्ति बताने वाले देशों की पराजय है। एक देश को आतंकवादियों के लिए छोड़ दिया गया है। फिर शरिया कानून लौटेगा और औरतों के बाजार लगेंगे। संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थिति 1935 वाले राष्ट्र संघ की रह गयी है, वह सिर्फ तमाशगीन है क्योंकि ऐसा करना अमेरिका जैसे राष्ट्रों के हित में है।

संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे संगठन का कार्य सिर्फ बड़े देशों की इच्छा पूर्ति का रह गया है। कोरोना के मामले में जिस तरह WHO चीन के पक्ष में खड़ा नजर आया वही स्थिति तालिबान के मामले में संयुक्त राष्ट्र संघ की दिखी।

विश्व की वामपंथी मीडिया जिस गर्माहट के साथ फिलिस्तीन मामले में इजरायल के विरुद्ध दिखाई दी थी, वह गर्माहट अफगानिस्तान के मामले में कहीं नहीं दिख रही है। यह एक प्रकार से विश्व का आतंकवाद के लिए तुष्टीकरण है, जिसका आने वाले समय में भयंकर परिणाम आना तय है।

एशिया सदा से अमेरिका, रूस और यूरोपीय देशों की प्रयोग स्थली रही है। अस्थिर एशिया ही हथियारों और सैनिक साजो सामान की खरीद – फरोख्त करेगा। अमेरिका आदि देश को अपनी बादशाहत साबित करने में मदद मिलेगी। मूर्ख एशिया ही तृतीय विश्व युद्ध का मैदान है।

जिस तरह से अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अपनी टीम के साथ देश छोड़ कर भागे हैं, वह आतंकवादी संगठनों को और प्रोत्साहन देगा। यही हाल ISIS ईरान में चाहता था। हिजबुल्ला सीरिया में, बोकोहराम नाइजीरिया में, तहरीके पाकिस्तान, पाकिस्तान में चाहता है। विश्व समुदाय ने तालिबानी शासन को जिस तरह से मौन स्वीकृति दी है, यह तृतीय विश्व युद्ध का बीजारोपण है। यह आने वाले समय में इतिहास हमें बतायेगा।

अमेरिका ने सत्ता हस्तांतरण आतंकवादी संगठन तालिबान को किया है। अधिकांश लोगों के समझ परे है कि जो अमेरिका इतने दिनों तक अफगानिस्तान में रहा, अब वह सत्ता तालिबान को देकर क्यों जा रहा है? लोकतंत्र की वकालत करने वाले मुल्क अफगानिस्तानी अफीम लेकर मस्त हैं। शायद आने वाले समय में कुछ और देशों को आतंकवादियों द्वारा बर्बाद किया जायेगा।


नोट: प्रस्तुत लेख, लेखक के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो।

***

अस्वीकरण: प्रस्तुत लेख, लेखक के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो। उपयोग की गई चित्र/चित्रों की जिम्मेदारी भी लेखक स्वयं वहन करता है।
Disclaimer: The opinions expressed in this article are the author’s own and do not reflect the view of the संभाषण Team. The author also bears the responsibility for the image/images used.

About Author

Dhananjay Gangay
Dhananjay Gangay
Journalist, Thinker, Motivational speaker, Writer, Astrologer🚩🚩
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments

कुछ लोकप्रिय लेख

कुछ रोचक लेख

Subscribe to our Newsletter
error: