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Sunday, October 2, 2022

मंदिर और मुसलमान

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Dhananjay Gangey
Dhananjay gangey
Journalist, Thinker, Motivational speaker, Writer, Astrologer🚩🚩
पढने में समय: 3 मिनट

आप कहते हैं उन्हें गले लगाओ। अरे साहब! हम उन्हें दूर ही कब किये थे? वो स्वयं पास नहीं रहना चाहते है। मैं बात कर रहा हूँ हिंद के भारतीय मुसलमानों की। आज लगभग 825 साल हो गये हैं जब दिल्ली में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना हुई थी। वैसे विदेशी मुसलमान भारत में अपने स्थापना के पूर्व (मुहम्मद) से आते रहे हैं। मोहम्मद बिन कासिम सन 712 में पाकिस्तान (तत्कालीन भारत) के कुछ हिस्से पर कब्जा कर लिया। फिर यह सिलसिला सुबुक्तगीन, गजनवी, गोरी तक चलता रहा। गजनवी ने सोमनाथ मंदिर, हरिद्वार के मंदिर और कन्नौज के मंदिर तोड़ दिये। जिसका कुछ विवरण उसके दरबारी अल बरुनी ने ‘किताबुल हिन्द’ में किया है। इल्तुतमिश ने दिल्ली को राजधानी बनाया। भारत में कत्लों गैरत होती रही, हिन्दू आस्था स्थल मंदिर को तोड़ा गया, कुछ को मस्जिद  बना दिया गया। जिसमें अढ़ाई दिन का झोपड़ा, कुतुबमीनार प्रसिद्ध है।

यह सिलसिला सभी मुस्लिम शासकों के दौर में में जारी रहा। जौनपुर के शर्की शासकों ने अटाला देवी के मंदिर को मस्जिद में तब्दील कर दिया।

बाबर के समय अयोध्या के श्रीराम मंदिर और संभल के मंदिर को मस्जिद बनाया गया। अयोध्या के राम मंदिर पर कब्जा के लिए हिन्दू 76 बार युद्ध कर चुके हैं। लाखों जाने गई हैं। अकबर ने प्रयाग के मंदिरों को विध्वंस करके किला बनवा दिया। शाहजहां ने तेजोमहालय शिवालय को कब्र बना दिया। औरंगजेब ने काशी के विश्वनाथ मंदिर के ऊपर मस्जिद चुनवा ली। देखा जाय तो काशी विश्वनाथ मंदिर इससे पहले तीन बार मुस्लिमों ने तोड़ चुके थे।

एक बार औरंगजेब दिल्ली के किले पर शाम के समय बैठा था, उसे एक प्रकाश दिखाई दिया। पूछा यह कैसा प्रकाश है तो दरबारियों ने बताया यह मथुरा के गोविंद देव मंदिर की दिव्य ज्योति है। फिर क्या, हुक्म जारी हुआ कि कल से ज्योति नहीं दिखे। मंदिर ध्वंस कर दिया गया। इन सब के बीच आप स्वयं सोच सकते हैं कि कितने हिंदुओं को मारा गया होगा।

एक प्रश्न बार – बार उठता है कि इतना महान देश जिसके क्षत्रियों की तलवारें किसी शत्रु के लिए मृत्यु की द्योतक थी वह इन मुल्लों से पराजित हो गये? तो आज की स्थिति को ही ले लीजिए एक नेता के पीछे पूरी राजनीति पड़ी है। सत्ता के लिए राम, शिव किसी को कुछ भी कहने को तैयार हैं। यदि सत्तासीन राजा थोड़ा भी कमजोर हुआ कि मुस्लिमों को आमंत्रण, आओ मेरे देश को लूटो और जाते समय हमें राजा बना देना। मैं सब तरह से तुम्हारी मदद को खड़ा हूँ। दुश्मन से ज्यादा दिक्कत घर के जयचंदो और मानसिंह की थी।

अब इसपर भारतीय मुस्लिम विचार करें। इतिहास में दिए गये घाव कभी भरते नहीं हैं। वह रह – रह के उभरते हैं। यहां के मुस्लिम जो हिन्दू से ही धर्मांतरित हैं। उन्हें तलवार और छल – बल से बनाया हुआ है, जो कि मुस्लिम नारीवादी तस्लीमा नसरीन भी कहती हैं। जब इस धर्मांतरित मुस्लिम को अरब के मक्का से इतना प्रेम है तो हिन्दूओं का सोच सकते हैं राम, कृष्ण और शिव से कितना प्रेम होगा जो कि हिंदुओं के पितर और देवता दोनों है।

मुस्लिम आगे बढ़े, उदारता दिखायें, हिंदुओं के पवित्र मंदिर से विवाद खत्म करें। माफी मांगें। पूर्वजों के कृत्यों के लिए, मस्जिद को दूसरी जगह शिफ्ट किया जा सकता है। वैसे भी यह स्थल मुहम्मद, अली, फातिमा, हसन, हुसैन से सम्बद्ध भी नहीं है। प्रेम सौहार्द परस्पर होता है एकपक्षीय नहीं। संबंध एक हाथ ले और एक हाथ दे पर आधारित है।

हिंदु खुले दिल, उदार विचार के लिए विश्व में प्रसिद्ध हैं। आगे समाज में राफ्ता का आधार मुसलमानों की बंधुता पर है यदि वो मानवता नहीं दिखाते हैं तो भी मंदिर कोर्ट से बन जायेगा। लेकिन समाज में वह एकांतिक हो जायेगा। अपने को अलग – थलग मानने पर विवश होगा।

भारतीय मुसलमानों को सोचना है उसे अपनी तरह रहना है कि अरबियों की नकल में जीवन बिता देना है? यदि वह एक कदम चलता है तो हिन्दू दस कदम चलने को तैयार हैं बस मंदिर, विवाद से निर्विवाद हो जाये। भारतीय संस्कृति को स्वीकारें। कुरान में कहा गया है, जो अपने मादरेवतन के साथ गद्दारी करता है वह कुछ भी हो सकता है किंतु मुसलमान नहीं है क्योंकि उसका मुकल्लम ईमान नहीं है। तुम्हारा जन्म जहन्नुम में हुआ हो तब भी उससे इश्क करो, सम्मान करो, वह तुम्हारा मादरेवतन, अहले वतन, सुन्नत और दफन होने की भूमि है। तुम फसाद छोड़ के शांति में प्रवेश करो, दूसरों के पूजा स्थल पर विवाद न करो। यहाँ से तुम्हारी दुआ कबूल नहीं होगी। काफिराना और शैतानित से निकलो, नेक और ईमान वाले बनो।

मुसलमानों को विचार करना है कि अहंकार छोड़ बंधुता के रास्ते चलना है और दीन और ईमान लाना है या जिहाद के नाम पर आतंकवाद जैसी शैतानियत पर फक्र करना है?

अस्वीकरण: प्रस्तुत लेख, लेखक/लेखिका के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो। उपयोग की गई चित्र/चित्रों की जिम्मेदारी भी लेखक/लेखिका स्वयं वहन करते/करती हैं।
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