वेणीमाधव प्रयाग के इष्टदेव

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Dhananjay Gangey
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प्रयाग की चर्चा बिना वेणीमाधव के अधूरी रह जाती है। वेद, स्कन्दपुराण, रामचरितमानस और प्रयाग माहात्म आदि ग्रन्थों में इनका वर्णन मिलता है, वेद में इनका वर्णन माधव नाम से है।

प्रयाग के लिए कहा जाता है कि सृष्टि कार्य सम्पन्न होने पर ब्रह्मा जी ने जहाँ यज्ञ किया वही स्थान प्रयाग है। प्र+याग अर्थात जहाँ प्रथम यज्ञ हुआ हो। यज्ञ की रक्षा के भगवान विष्णु 12 स्वरूप में अवतरित हुये।

त्रिवेणी माधवं सोमं भारद्वाजं च वासुकीम्‌।
वन्दे अक्षयवटं शेषं प्रयागं तीर्थनायकम्‌॥

यह 12 रूप शंख माधव, चक्र माधव, गदा माधव, पद्यमाधव, अनंत माधव, मनोहर माधव, असि माधव, संकटहर माधव, विष्णु माधव, वट माधव और वेणी माधव। यही वेणीमाधव प्रधान हैं, वेणी नाम मध्य में होने की वजह से पड़ा।

देव पूजहि माधव पद जल जाता।
परसि अक्षयवट हरषहिं गाता॥

भगवान विष्णु यहाँ लक्ष्मी – नारायण के रूप में विराजते हैं। यह विग्रह काले शालिग्राम प्रस्तर की है। मंदिर का मुख पूर्व का है, यही सन्मुख ही भगवान शिव भी शूलकंटकेश्वर रूप में हैं, यह हरिहर के मिलन का भव्य स्थल है।

यह स्थान असिमाधव क्षेत्र में प्रयागराज के दारागंज के निरालानगर में है। चैतन्य महाप्रभु जब भी प्रयाग आते तो घण्टों विग्रह को निहारते और नृत्य की मुद्रा में झूमते रहते। यह मंदिर गंगा तट, दशाश्वमेध घाट से 500 मीटर की दूरी पर है। यही ब्रह्मा जी का यज्ञ स्थल है, एक ही वेदी में ब्रह्मेश्वर, दशाश्वमेधश्वर भारत का एक अनोखा शिवलिंग है साथ प्राचीन प्रस्तर की गणेशजी का भी विग्रह है।

एक अन्यत्र कथा में वर्णन आता है कि गजकर्ण नाम के राक्षस को एक्जिमा (खुजली) हो गया था, नारद जी ने उसे त्रिवेणी में स्नान करने से स्वस्थ होने का परामर्श दिया। वह स्नान करने से स्वस्थ हो जाने के बाद त्रिवेणी के पवित्र जल के महत्व को देखते हुए पी गया। जिसके बाद भगवान माधव दो दिन के युद्ध में गजकर्ण का वध कर त्रिवेणी को मुक्त कराया। यही प्रयाग की रक्षा द्वादश माधव के रूप करने लगे।

यहाँ एकादशी को बहुत भीड़ रहती है साथ ही माघ मेले, अर्द्ध कुम्भ और कुंभ में तो इसकी छटा निराली रहती है। “माधव सकल काम साधव” से मंदिर गुंजायमान रहता है। यदि प्रयाग स्नान किया और इनके इष्टदेव वेणी माधव के दर्शन नहीं किये तो कहा जाता है कि प्रयाग त्रिवेणी स्नान का फल पूरा नहीं मिलता है।

यहां अनुपम शांति मिलती है, मन बहुत प्रसन्न हो जाता है, यही लगता है कि पहले क्यों नहीं आये।

माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥
देव दनुज किंनर नर श्रेनीं। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥


नोट: प्रस्तुत लेख, लेखक के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो।

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Dharmendra Kumar Singh
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2 years ago

यह आप माधव के सम्बंध में गलत विवरण दे रहे हैं

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