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Monday, June 14, 2021
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    धर्मो रक्षति रक्षितः

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    एक विचार
    एक विचार
    स्वतंत्र लेखक, विचारक

    पढने में समय: 6 मिनटयदि हम धर्म की रक्षा करते हैं तो वह हमारी रक्षा करता है।

    यह मनुस्मृति अध्याय 8 का 15वां श्लोक है, जो पूरा इस प्रकार से है:

    धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
    तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्।। (मनुस्मृति 8/15)

    अर्थात: धर्म का लोप कर देने से वह लोप करने वालों का नाश कर देता है और रक्षित किया हुआ धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन कभी नहीं करना चाहिए, जिससे नष्ट धर्म कभी हमको न समाप्त कर दे।

    यह कैसे संभव है?

    यह समझने के लिए हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि धर्म क्या है?

    वैदिक सनातन व्यवस्था में ‘धर्म’ शब्द ‘ऋत’ पर आधारित है। ‘ऋत’ वैदिक धर्म में सही सनातन प्राकृतिक व्यवस्था और संतुलन के सिद्धांत को कहते हैं, यानि वह तत्व जो पूरे संसार और ब्रह्माण्ड को धार्मिक स्थिति में रखे या लाए। वैदिक संस्कृत में इसका अर्थ ‘ठीक से जुड़ा हुआ, सत्य, सही या सुव्यवस्थित’ होता है।

    ऋग्वेद के अनुसार – ”ऋतस्य यथा प्रेत”  अर्थात प्राकृत नियमों के अनुसार जीओ।

    लेकिन इस सूत्र का मात्