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Wednesday, April 14, 2021
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    तृन धरि ओट कहति बैदेही

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    एक विचार
    एक विचार
    स्वतंत्र लेखक, विचारक

    पढने में समय: 3 मिनटसीता जी के विषय में वाल्मीकि रामायण (जो सबसे अधिक प्रमाणिक है) के अनुसार विचार करने पर इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि जगतजननी माता सीता रावण को कभी भी भस्म कर सकती थीं।

    सीता जी रावण से कहती हैं :

    असन्देशान्तु रामस्य तपसश्चानुपालनात्।
    न त्वां कुर्मि दशग्रीव भस्म भस्मार्हतेजसा॥ – वा.रा.

    अर्थात, राम का सन्देश न होने से, तपस्यानाश के भय से हे दशग्रीव! मैं अपने उग्र तेज से तुझे भस्म नहीं कर रही हूं।

    दूसरी ओर तुलसीकृत रामचरित मानस में आया है :

    तृन धरि ओट कहति बैदेही।
    सुमिरि अवधपति परम सनेही॥

    अर्थात, अपने परम स्नेही कोसलाधीश श्री रामचंद्रजी का स्मरण करके जानकीजी तिनके की आड़ (परदा) करके कहने लगीं :

    सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा।
    कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥

    अस मन समुझु कहति जानकी।
    खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥

    अर्थ : हे दशमुख! सुन, जुगनू के प्रकाश से कभी कमलिनी खिल सकती है? जानकीजी फिर कहती हैं- तू (अपने लिए भी) ऐसा ही मन में समझ ले। रे दुष्ट! तुझे श्री रघुवीर के बाण की खबर नहीं है।

    वाल्मीकि रामायण में यह प्रसंग सुंदरकांड में 21वें सर्ग के 3सरे श्लोक में आया है। माता सीता कहती हैं :

    तृणमन्तरतः कृत्वा प्रत्युवाच शुचिस्मिता।”

    अर्थात, पवित्र मुस्कान वाली विहेदनंदिनी ने तिनके की ओट करके रावण को इस प्रकार उत्तर दिया।

    लेकिन लोकाचार में “तृन धरि ओट कहति बैदेही” की एक और कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है :

    रावण जब माँ सीता जी का हरण करके लंका ले गया तब लंका मे सीता जी वट वृक्ष के नीचे बैठ कर चिंतन करने लगी। रावण बार – बार आकर माँ सीता जी को धमकाता था लेकिन माँ सीता जी कुछ नहीं बोलती थी।

    यहाँ तक की रावण ने श्री राम जी के वेश मे आकर माँ सीता जी को भ्रमित करने की भी कोशिश की लेकिन फिर भी सफल नहीं हुआ।

    रावण थक हार कर जब अपने शयन कक्ष में गया तो मंदोदरी ने उससे कहा आप तो राम का वेश धर कर गये थे, फिर क्या हुआ? रावण बोला – जब जब मैं राम का रूप लेकर सीता के समक्ष गया तो सीता मुझे नजर ही नहीं आ रही थी।

    रावण अपनी समस्त ताकत लगा चुका था लेकिन जिस जगत जननी माँ को आज तक कोई नहीं समझ सका, उन्हें रावण कैसे समझ पाता?

    रावण एक बार फिर आया और बोला मैं तुमसे सीधे – सीधे संवाद करता हूँ लेकिन तुम कैसी नारी हो कि मेरे आते ही घास का तिनका उठाकर उसे ही घूर – घूर कर देखने लगती हो? क्या घास का तिनका तुम्हें राम से भी ज्यादा प्यारा है?

    रावण के इस प्रश्न को सुनकर माँ सीता जी बिलकुल चुप हो गयी और उनकी आँखों से आसुओं की धारा बह पड़ी।

    इसकी सबसे बड़ी वजह थी कि जब श्री राम जी का विवाह माँ सीता जी के साथ हुआ, तब सीता जी का बड़े आदर सत्कार के साथ गृह प्रवेश भी हुआ। बहुत उत्सव मनाया गया।

    प्रथानुसार नव वधू विवाह पश्चात जब ससुराल आती है तो उसके हाथ से कुछ मीठा पकवान बनवाया जाता है, ताकि जीवन भर घर में मिठास बनी रहे। इसलिए माँ सीता जी ने उस दिन अपने हाथों से घर पर खीर बनाई और समस्त परिवार, राजा दशरथ एवं तीनों रानियों सहित चारों भाईयों और ऋषि संत भी भोजन पर आमंत्रित थे।

    माँ सीता ने सभी को खीर परोसना शुरू किया और भोजन शुरू होने ही वाला था कि एक हवा का झोका आया। सभी ने अपनी अपनी थाली सम्भाली, सीता जी बड़े गौर से सब देख रहीं थीं। ठीक उसी समय राजा दशरथ जी की खीर पर एक छोटा सा घास का तिनका गिर गया, जिसे माँ सीता जी ने देख लिया।

    लेकिन अब खीर मे हाथ कैसे डालें? ये प्रश्न आ गया। माँ सीता जी ने दूर से ही उस तिनके को घूर कर देखा वो जल कर राख की एक छोटी सी बिंदु बनकर रह गया। सीता जी ने सोचा ‘अच्छा हुआ किसी ने नहीं देखा’। लेकिन महाराजा दशरथ माँ सीता जी के इस चमत्कार को देख रहे थे। फिर भी दशरथ जी चुप रहे और अपने कक्ष पहुँचकर माँ सीता जी को बुलवाया। फिर उन्होंने सीताजी से कहा कि मैंने आज भोजन के समय आप के चमत्कार को देख लिया था।

    आप साक्षात जगत जननी स्वरूपा हैं, लेकिन एक बात आप मेरी जरूर याद रखना। आपने जिस नजर से आज उस तिनके को देखा था उस नजर से आप अपने शत्रु को भी कभी मत देखना। इसीलिए माँ सीता जी के सामने जब भी रावण आता था तो वो उस घास के तिनके को उठाकर राजा दशरथ जी की बात याद कर लेती थी। माता सीता जी चाहती तो रावण को उस जगह पर ही भस्म कर सकती थीं, लेकिन राजा दशरथ जी को दिये गये वचन एवं भगवान श्रीराम द्वारा रावण-वध विधि का विधान होने के कारण का वो शांत रहीं।

    ऐसी विशालहृदया थीं हमारी जानकी माता।


    नोट: प्रस्तुत लेख, लेखक के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो।

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