समर्पण : प्रेम की आत्मा

समर्पण वह मौन भाषा है, जिसके माध्यम से प्रेम शब्दों से आगे बढ़कर आत्मा का स्पर्श करता है। प्रेम में जितना गहरापन आता है, जितनी प्रगाढ़ता उत्पन्न होती है, वह समर्पण के माध्यम से ही संभव होती है।

समर्पण वह मौन भाषा है, जिसके माध्यम से प्रेम शब्दों से आगे बढ़कर आत्मा का स्पर्श करता है। प्रेम में जितना गहरापन आता है, जितनी प्रगाढ़ता उत्पन्न होती है, वह समर्पण के माध्यम से ही संभव होती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सूचना पर नहीं, सत्य पर विश्वास करें; भावनाओं पर नहीं, विवेक पर निर्णय लें। किसी भी विमर्श का हिस्सा बनने से पहले अपने “कान” को देखें

महत्वाकांक्षा मनुष्य के भीतर विद्यमान वह चिंगारी है, जो उसे यथास्थिति से आगे बढ़ने का साहस देती है। यही आकांक्षा व्यक्ति को सतत विकासशील बनाती है, उसे नए विचारों, नए प्रयोगों और नए आयामों की ओर प्रेरित करती है।

रिश्तों की बुनियाद दिखावे, अपेक्षाओं या शर्तों पर नहीं टिकी होती। इन्हें जीवित रखने के लिए चाहिए संवेदनशील समझ, संयमित धैर्य और निष्कपट अपनापन।

हम मनुष्य बड़े सहज भाव से यह मान लेते हैं कि जो कुछ आज हमारे साथ घट रहा है, वह अचानक है, अन्यायपूर्ण है या बिना कारण है। समय के प्रवाह में हम अपने उन कर्मों को भूल जाते हैं, जो कभी हमने किसी और के मन, आत्मा या जीवन पर किए थे।

इतिहास की दृष्टि से पहले सृष्टि, फिर स्थिति, फिर संहार होता है। साधना में संहार, पालन और उत्पादन यह क्रम मान्य होता है।

स वा इदं विश्वममोघलील (श्रीमद्भागवत), भगवान की लीला अमोघ है, वे लीला से ही इस संसार का सृजन, पालन और संहार करते हैं किन्तु इसमें आसक्त नहीं होते। चक्रपाणि भगवान की शक्ति और पराक्रम अनन्त है, उनकी कोई थाह नहीं पा सकता।

स्त्रियों को मंत्र से पूर्व भी ॐकार का जप नहीं करना चाहिए, श्री लगाया जाता है। भगवान शंकर ने पार्वतीजी को उपदेश करते हुए कहा है कि ॐकार सहित मंत्र स्त्रियों के लिए विष के समान है।

अत्यन्त आर्त भाव से प्रार्थना किए जाने पर देवाधिदेव महादेव ने उन देवताओं को अभयदान दिया और आश्वस्त किया कि ‘मैं उनका संहार करूँगा’।

न वै मृत्य:, मृत्यु है ही नहीं। मृत्यु व्याघ्र के समान प्राणियों का भक्षण नहीं करती है, इसका कोई रूप नहीं देखा जाता है, अतः मृत्यु तो है ही नहीं।

वह कौन सा वन था? अथवा वह कौन सा वृक्ष था? जिससे ये स्वर्ग और पृथ्वी छाँट कर अलग किए गए। हे मनीषी विद्वद्गण! अपने मन से मनन करके पूछिए की कौन इन चौदह भुवनों को धारण करता हुआ अध्यक्ष बनकर बैठा है?

कार्तवीर्य उसी यदुवंश में थे जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। विष्णु पुराण में कहा गया है - “जिस वंश में श्रीकृष्ण नामक निराकार परब्रह्म ने अवतार लिया था, उस यदुवंश का श्रवण करने मात्र से मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।“

जिस मृतक का पिण्डदान नहीं हुआ है वह सूक्ष्म शरीर के निर्माण होने तक आकाश में भटकता ही रहता है, वह क्रमशः तीन दिन जल में, तीन दिन अग्नि में, तीन दिन आकाश में और एक दिन अपने घर में निवास करता है।

“पार्वती वा त्वया तुल्या वर्तते नैव भिद्यते” अर्थात पार्वती तुम्हारी ही सदृश हैं (तुम्हारे समान मेरा कोई प्रिय नहीं है), परंतु वह (हनुमान जी) तो मुझसे सर्वथा अभिन्न है।

सभी दर्शनों में मुख्य अंतर यह है कि ये जीव, जगत और ब्रह्म के संबंध को विभिन्न दृष्टिकोणों से समझाते हैं और प्रत्येक का विशिष्ट माध्यम और दर्शन है।