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Tuesday, October 19, 2021

लोकतंत्र या भीड़तंत्र?

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स्वतंत्र लेखक, विचारक
पढने में समय: 3 मिनट

लोकतंत्र, जिसका शाब्दिक अर्थ है “लोगों का शासन”। संस्कृत में लोक, “जनता” तथा तंत्र, “शासन” या प्रजातंत्र।

परिभाषा के अनुसार यह “जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन है”। लेकिन अलग-अलग देश, काल और परिस्थितियों में अलग-अलग धारणाओं के प्रयोग से इसकी अवधारणा कुछ जटिल हो गयी है। प्राचीनकाल से ही लोकतंत्र के सन्दर्भ में कई प्रस्ताव रखे गये हैं, पर इनमें से कई कभी क्रियान्वित ही नहीं हुए।
एक तरफ जहां भीम राव अम्बेडकर के शब्दों में- ‘लोकतंत्र का अर्थ है, एक ऐसी जीवन पद्धति जिसमें स्वतंत्रता, समता और बंधुता समाज-जीवन के मूल सिद्धांत होते हैं।’

वही दूसरी ओर नोबल पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार और कुशल राजनीतिज्ञ जॉर्ज बनार्ड शा के शब्दों में ‘लोकतंत्र, अपनी महंगी और समय बर्बाद करने वाली खूबियों के साथ सिर्फ भ्रमित करने का एक तरीका भर है जिससे जनता को विश्वास दिलाया जाता है कि वह ही शासक है जबकि वास्तविक सत्ता कुछ गिने-चुने लोगों के हाथ में ही होती है।’

उपरोक्त दो व्यक्तियों के लोकतंत्र के बारे में परस्पर विरोधी विचार लोकतंत्र के व्यापक अर्थ को बताने के लिए पर्याप्त हैं। ‘लोकतंत्र’ शब्द राजनीतिक शब्दावली के सर्वाधिक इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों में से एक है। यह महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो अपनी बहुआयामी अर्थों के कारण समाज और मनुष्य के जीवन के बहुत से सिद्धांतों को प्रभावित करता है।

अब आते हैं भारत में लोकतंत्र के आज के स्वरूप पर। भारत आदि काल से ही ज्ञान, विज्ञान, राजनीति, समाज आदि हर एक विषय में सम्बृद्ध रहा है। ईश्वर ने उत्पत्ति के बाद ईश्वरीय निर्देश के रूप में वेदों को दिया। वेदों को भलीभाँति पढ़ने और समझने वाले विद्वान जानते हैं कि मानव जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं, जिसका तर्कपूर्ण, मानव मात्र के लिए स्वीकार करने योग्य विज्ञान वेदों में न हो। अथर्ववेद का एक ही मंत्र ‘दिवं च रोह पृथिवी च रोह राष्ट्रं च रोह द्रविणं च रोह’, अर्थात्‌ ‘हे मनुष्य! तू आत्मिक उन्नति कर, शारीरिक उन्नति कर, राष्ट्रीय उन्नति कर और धन-संपत्ति की उन्नति कर।’ इन सभी बातों की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त है। वेद हमारे जीवन के विविध पक्षों के संतुलित विकास की व्यवस्था देते हैं।

आज के बुद्धिवादियों का मानना है कि लोकतांत्रिक रीति से शासक का चयन करना नए युग की बात है। ऐसी धारणा वे ही बना और रख सकते हैं, जिन्होंने वेद न पढ़े हों। जबकि वेद पढ़ने वाले सभी लोग जानते हैं कि लोकतंत्र का मूल स्रोत वेद ही है। अथर्ववेद के अनुसार- ‘त्वां विशो वृणतां राज्याय’ अर्थात्‌ हे राजन! तुझे राज्य के लिए प्रजा ने चुना है।

अब, जब लोकतंत्र एक वैदिक विचारधारा है तब समस्या कहाँ? जैसा कि आज के लोकतंत्र में चुनाव करने का अधिकार 18 वर्ष के ऊपर सभी को मिलता है, चाहें बौद्धिक रूप से वह कैसा भी हो जबकि वैदिक लोकतंत्र कहता है- ‘त्वामग्ने वृणुते ब्राह्माणा इमे शिवो अग्ने संवरणो भवा न’ अर्थात हे तेजस्वी राजन! धार्मिक विद्वान लोगों ने जो तेरा वरण किया है, वह तेरा चयन हमारे लिए कल्याणकारी हो। यहाँ स्पष्ट है कि राजा चुनने का कार्य श्रेष्ठ एवं विद्वानों का है। आज के लोकतंत्र में राजा शब्द का अर्थ राष्ट्राध्यक्ष से ही है।

अतः वेदों के अनुसार राष्ट्राध्यक्ष का चुनाव गुणवानों द्वारा आम चुनाव प्रक्रिया से होना चाहिए न कि 18 वर्ष के ऊपर के सभी व्यक्तियों द्वारा या चुने गए प्रत्याशियों द्वारा जैसा कि अमेरिका में होता है। इसीका नतीजा है कि आज सरकारें काम या उनके दूरदर्शी नीतियों को देख कर नहीं बल्कि मुफ्त बिजली, पानी और ऋण माफ़ी के कोरे आश्वासनों पर बनाई जाने लगी हैं, अब बिना काम के मुफ्त के खाने के लालच से आप कौन सी बेहतर सरकार कि उम्मीद करते हैं? इसी समाज में कई लोग जिन्हें अपने माँ-बाप को देखने तक कि फुर्सत नहीं वो गो माता और गंगा मैया के स्थिति पर चिंतित होते हैं। आज लोकतंत्र के नए-नए उभरते दोषों को देखकर कई लोग इसे भीड़तंत्र भी कहने लगे हैं। जब हमारा आयु आधारित लोकतंत्र भीड़ तंत्र कहलाने लगा हो तो बुद्धिमानों को चाहिए कि वे लोकतंत्र की वैदिक अवधारणा पर खुले हृदय से विचार करें।

ऋग्वेद के मंत्र ‘त्रीणि राजाना विदथे पुरूणि परि विश्वानि भूषथः सदांसि’ की व्याख्या करते हुए महर्षि दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है – ‘राजा, प्रजा और पुरुष मिलकर राष्ट्र यज्ञ के संचालनार्थ तीन सभाएं विद्यार्थ सभा, धर्मार्यसभा और राजार्थ सभा का निर्माण करें।’ सभाओं व परिषदों में पदाधिकारी नियुक्त करने के संबंध में राजा को चाहिए कि अधिकारी की नियुक्ति में प्रजा की सम्मति भी ग्रहण करे क्योंकि ऐसा होने पर उपद्रव नहीं होता।’

अब या तो जो स्थिति है आप उसी में अपने स्तर पर ही सही लेकिन बेहतर करिए या बेहतर की उम्मीद के साथ बदलाव की बात करिए, दोनों ही स्थितियों में जिम्मेदारी तो आप पर ही है।

***

नोट: प्रस्तुत लेख, लेखक के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो।
Note: The opinions expressed in this article are the author’s own and do not reflect the view of the संभाषण Team.

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Usha
Usha
2 years ago

Bahut achhi prstuti di h aj ke samaye me vedo dvara hi loktantra ki unnati sambhav h

Dhananjay Gangay
Dhananjay Gangay
2 years ago

शानदार प्रस्तुति शास्त्रों में लोकतंत्र को किस तरह लिया गया है

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