उत्तिष्ठत मा स्वप्त अग्निमिच्छध्वं भारताः

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हमारे देश का नाम ‘भारत’ कैसे पड़ा? यह एक ऐसा प्रश्न है कि यदि आप सामान्य जन से करें तो आपको उत्तर तो अवश्य मिलेंगे किन्तु कई प्रकार के भिन्न-भिन्न उत्तर मिलेंगे। यदि धर्म को जानने वाले व्यक्ति से पूछें तो उनसे भी शास्त्रों पर आधारित भिन्न-भिन्न उत्तर मिलेंगे। कहने का अर्थ है कि हमारे देश का नाम भारत कैसे पड़ा इस पर कोई सटीक उत्तर मिले, ऐसा कम ही होता है।

वेद, पुराण आदि शास्त्रों से उद्धरण लेते हुए हम इसी विषय पर चर्चा करेंगे। अपने देश का नाम ‘भारत’ शब्द के प्रयोग पर मुख्य रूप से –

१. वैदिक मत
२. पौराणिक मत और
३. लोकमत पर विचार करेंगे।

वैदिक मत में भारत शब्द के ‘विज्ञान पक्ष’ के अनुसार, पौराणिक मत में इसके ‘इतिहास पक्ष’ के अनुसार और लोकमत में इसके ‘व्यवहार पक्ष’ के अनुसार विचार करेंगे।

१. वैदिक मत :

भारत शब्द का उल्लेख ऋग्वेद काल से मिलने लगता है। कुछ स्थानों पर यह शब्द अग्नि-विशेष के पर्याय के रूप में भी आया है, यथा ४.२५.४; ६.१६.१९ आदि। किन्तु ऋग्वेद ३.५३.१२ में स्पष्ट रूप से यह जन का नाम है – विश्वामित्रस्यरक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनम्।” ‘भारत’ इस नाम का मूल स्रोत यही माना जा सकता है। तैत्तिरीय आरण्यक १.२७.३ में भी स्पष्टतः भारत के जनों का सम्बोधन है – “उत्तिष्ठत मा स्वप्त अग्निमिच्छध्वं भारताः” – हे भारतीयों! उठो, सोते मत रहो, अग्नि को प्राप्त करो अर्थात् पुरुषार्थ करो।  

वैदिक मत के अनुसार भारत शब्द के प्रयोग पर मुख्य बिन्दु :

·       वैदिकों का मत है कि प्राचीन देवयुग में इन्द्र ने मनुष्यलोक का अधिपति भरत रूप अग्नि को नियुक्त किया, वही अग्नि मनु था।

·       पण्डित मधुसूदन ओझा जी के अनुसार देवयुग में जिस ‘भौम्य त्रैलोक्य’ की व्यवस्था की गई थी, उसमें भारतवर्ष को पृथ्वीलोक कहा गया था और यही मनुष्यलोक है। जिस प्रकार स्वर्ग का स्वामी इन्द्र है तथा वायु को अन्तरिक्ष का अधिपति बताया गया है, उसी प्रकार पृथ्वी का अधिपति अग्नि है और इस अग्नि का नाम ही भरत है। जिस प्रकार देवताओं का स्वामी इन्द्र है तथा देवयोनि (यक्ष, गन्धर्वादि मनुष्य देव) का स्वामी वायु है उसी तरह यह अग्नि मनुष्यों का अधिपति है और उसी अग्नि के नाम से भारत माना गया है। ये सभी देवता अपने अपने लोक के अध्यक्ष हैं, बल के रक्षक हैं। द्युलोक में मरूत् विचरण करते हैं, अन्तरिक्ष में वायुदेव और इसी तरह भूमि पर भारत (भरण करने वाला) अग्नि और समुद्र के जल में वरुण देव विचरण करते हैं। ऋग्वेद में लिखा है – हे बल के रक्षक, देदीप्यमान देवगण तुम्हें पाने की इच्छा करते हुए मरुद्गण द्युलोक से जाते हैं, अग्नि भूलोक से जाता है, वायु अन्तरिक्ष से जाता है तथा वरुण देव जल-प्रवाह में विचरण करता है।

दि॒वा या॑न्ति म॒रुतो॒ भूम्या॒ग्निर॒यं वातो॑ अ॒न्तरि॑क्षेण याति।
अ॒द्भिर्या॑ति॒ वरु॑णः समु॒द्रैर्यु॒ष्माँ इ॒च्छन्त॑: शवसो नपातः ॥
– ऋग्वेद १.१६१.१४

·       ऋग्वेद के चौथे मण्डल के पच्चीसवें सूक्त में इस पृथ्वी लोक का, जो कि मनुष्यलोक है, अधिपति अग्नि ही भारत नाम से कहा गया है। जो मनुष्यों का हित करने वाले, आगे ले जाने वाले तथा नेताओं में सर्वोत्तम हैं, ऐसे इन्द्र के लिए हम सोम रस निकालें, ऐसा कहते हैं। उसके लिए भरण पोषण करने वाला अग्नि सुख प्रदान करें तथा मनुष्य उदित होते हुए सूर्य का चिरकाल तक दर्शन करें।

तस्मा॑ अ॒ग्निर्भार॑त॒: शर्म॑ यंस॒ज्ज्योक्प॑श्या॒त्सूर्य॑मु॒च्चर॑न्तम् ।
य इन्द्रा॑य सु॒नवा॒मेत्याह॒ नरे॒ नर्या॑य॒ नृत॑माय नृ॒णाम् ॥

– ऋग्वेद ४.२५.४

·       यजुर्वेद के आवरण में जो “दर्शपूर्णमासेष्टि” का वर्णन प्राप्त होता है, उसमें सामिधेन्य कर्म में भी भारत रूप अग्नि को जागृत (उपमर्दन) करते हैं।

·       हे अग्नि! तुम महान् हो, तुम ब्राह्मण हो, तुम भारत हो ।” इस पूर्वोक्त मंत्र में अग्नि को भारत कहा गया है, यह अग्नि देवताओं के लिए हवि का भरण करता है। अतः ब्राह्मण ग्रन्थों में अथवा ब्राह्मण ग्रन्थों की भाषा में इसी अग्नि को भारत कहा गया है।

·       अग्निर्वै भरतः। स वै देवेभ्यो हव्यं  भरति॥ कोषीतकि ब्राह्मण। अर्थात् यह अग्नि ही भरत है। यही देवताओं के लिए हवि का भरण करता है।
यह अग्नि ही देवताओं के लिए हवि का भरण करता है, इसलिए अग्नि को भरत कहा गया है। यह अग्नि इन प्रजाओं का प्राण रूप होकर भरण करता है, इसलिए इसे भारत कहा गया है। इसीलिए इसे भरतवत् कहा गया है (वाजसनेय ब्राह्मण)।

·       अग्नि अथर्वा ऋषि द्वारा उत्पन्न है। यह समस्त प्रकार के स्तुति एवं स्तोत्रों को जानता है। यह अग्नि इच्छित देवों को बुलाने के लिए यजमान का दूत भी है।

यत्पा॑क॒त्रा मन॑सा दी॒नद॑क्षा॒ न य॒ज्ञस्य॑ मन्व॒ते मर्त्या॑सः ।
अ॒ग्निष्टद्धोता॑ क्रतु॒विद्वि॑जा॒नन्यजि॑ष्ठो दे॒वाँ ऋ॑तु॒शो य॑जाति ॥

– ऋग्वेद १०.२.५

·       हे भरण पोषण करने वाले अग्नि! तुम ऊर्ध्वगति से जाने वाली ज्वाला से प्रकाशित हो। हे अजर! प्रकाशमान! तुम कान्तिमान् होकर अजस्र तेज से युक्त हो (काण्व० ६.१६.४५)।

·       हे तेजस्वी अग्नि देव! भरत ने बलवान् पुरुषों के साथ भौतिक और अभौतिक सुख देने वाले तुम्हारी स्तुति की तथा पूजनीय देव का तुम्हारे यज्ञों में यजन किया (काण्व० ६.१६.४)।

इस प्रकार अनेक बार अनके महर्षियों ने भारत को ही अग्नि कहा है। उस समय वही भरत दिवोदास था, वही मान्धाता था। मत्स्यपुराण के ११४वें अध्याय में मनु के संबंध में भारत की व्याख्या की गई है। वह लोकपाल मनु तो अग्नि ही है। भरण-पोषण करने से तथा उत्पन्न करने के कारण ही यह मनु भरत कहा जाता है। “भरणात्प्रजनाच्चैष मनुर्भरत उच्यते”निरुक्तके इस वचन के अनुसार ऐसा देश जो भरण पोषण करने वाला है, को भारत मानना चाहिये। 

२. पौराणिक मत :

स्वायम्भुव मनु के “आग्नीध्र्” नाम के पुत्र हुए, आग्नीध्र् के नाभि, नाभि के ऋषभ हुए और उनके पुत्र भरत हुए, जिनका यह देश हुआ अर्थात् इन्हीं भरत के नाम से यह देश “भारत” कहलाया।

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार आग्नीध्र् के पुत्र नाभि हुए, उनके पुत्र ऋषभ और ऋषभ के भरत नाम का पुत्र हुआ, जो सौ पुत्रों में सर्वश्रेष्ठ था। “हिम” नाम का दक्षिण वर्ष अर्थात् “हैमवतवर्ष” नाम का देश पिता ने भरत को दिया। उस भरत नाम के महात्मा के नाम से ही यह भारतवर्ष प्रसिद्ध हुआ।

विष्णुपुराण के अनुसार इसी भरत से ही यह भारतवर्ष इस लोक में प्रसिद्ध हुआ। विष्णु पुराण में लिखा है – “भरत के पिता ने वन में प्रस्थान करते समय भरत को यह देश प्रदान किया था।

ततश्च भारतं वर्षमेतल्लोकेषु गीयते ।
भरताय यतः पित्रा दत्तं प्रातिष्ठता वनम् ॥
– विष्णुपुराण, द्वितीय अंश, अध्याय १, श्लोक ३२।

स्कन्दपुराण के अनुसार नाभि के पुत्र ” ऋषभ” और ऋषभ के पुत्र भरत हुए, उन्हीं के नाम से यह देश “भारतवर्ष” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

नाभेः पुत्रश्च ऋषभ ऋषभाद्बरतोऽभवत्।
तस्य नाम्ना त्विदं वर्षं भारतं चेति कीर्त्यते॥
– स्कन्दपुराण, माहेश्वरखण्ड, कुमारिकाखण्ड, अध्याय ३७.५७।

अग्निपुराण के अनुसार जो दुष्यन्त और शकुन्तला का पुत्र भरत था वह समस्त शत्रुओं का दमन करने वाला था, उसी के नाम से यह देश भारत देश है। अग्निपुराण में लिखा है – ‘तंसुरोध का पुत्र दुष्यन्त, दुष्यन्त से शकुन्तला पुत्र भरत हुआ, जिसके नाम से इस देश का नाम “भारत” पड़ा।

तंसुरोघाच्च चत्वारो दुष्मन्तोऽथ प्रवीरकः ।
सुमन्तश्चानयो वीरो दुष्मन्ताद्भरतोऽभवत् ॥
शकुन्तलायान्तु बली यस्य नाम्ना तु भारताः ।
– अग्निपुराण २७८.६-७।

यह भरत जगद्-विजयी (चक्रवर्ती) था, ऐसा वेद और पुराणों में प्रदर्शित किया गया है। “शतपथ ब्राह्मण” के तेरहवें काण्ड में यह भरत अश्वमेध यज्ञ करने वाला बताया गया है।

शतपथ ब्राह्मण” १३वें काण्ड  में लिखा है – ‘दुष्यन्त के पुत्र भरत ने “वृत्रघ्न” इन्द्र के लिए अठहत्तर घोड़े यमुना के किनारे तथा पचपन घोड़े गंगा के किनारे बांधे अर्थात् इतनी संख्या में अश्वमेध यज्ञ किये। शकुन्तला नाम की अप्सरा ने भरत को जन्म दिया, जिसने प्राचीनकाल में सम्पूर्ण पृथ्वी को जीत कर एक हजार अश्वमेध यज्ञ किये। पूर्व काल अथवा उत्तर काल के कोई भी जन भरत की कीर्ति को नहीं पा सकते हैं तथा मर्त्य लोक के प्राणी सातों मन्वन्तर में होने वाले मनुष्य, ऋषि और महर्षि इत्यादि भी द्युलोक को अपने हाथों से अथवा पांवों से प्राप्त नहीं कर सकते हैं।

स्कन्दपुराण के प्रभास खण्ड के १७२वें अध्याय में ऋषभ के पुत्र भरत द्वारा किये गये अश्वमेध यज्ञ का उपरोक्त प्रकार से वर्णन किया गया है।

भरत के नाम से यह देश ही भारत नहीं कहलाया अपितु महाभारत में लिखा है कि इस भरत के नाम से इस कुल में उत्पन्न होने वाले सभी लोग भारत कहलाये। महाभारत के आदिपर्व में लिखा है –

दुष्यन्तस्तु तदा राजा पुत्रं शाकुन्तलं तदा ।
भरतं नामतः कृत्वा यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ॥
– महाभारत, आदिपर्व, अध्याय ७४.१२६

तब राजा दुष्यन्त ने शकुन्तला के पुत्र भरत को उसके नाम से अर्थात् “भारत” नाम से युक्त करके युवराज पद पर अभिषिक्त किया।

भरताद् भारती कीर्तिर्येनेदं भारतं कुलम् ।
अपरे ये च पूर्वे वै भारता इति विश्रुताः ॥
– महाभारत, आदिपर्व, अध्याय ७४.१३१

भरत से ही इस भुखण्ड अथवा भूमि का नाम भारत हुआ। उन्हीं से यह वंश भरत वंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उनके बाद उस कुल में पहले तथा आज भी जो राजा हुए, वे भी भारत कहे जाते हैं।

३. लोकमत :

भूमि पर खेत की अग्नि (उपज की क्षमता) धान्य को उत्पन्न करती है और मानव शरीर में ऊष्मा तत्त्व के रूप में विद्यमान अग्नि भरण पोषण करती है। इसलिए यह अग्नि सम्पूर्ण मानव मात्र के भरण पोषण के स्वभाव को धारण करती है।

हम दानदाता के रूप में वृद्धि को प्राप्त करें, हमारा दातृत्व बढ़े, हमारा ज्ञान और सन्तति बढ़े! हमारी श्रद्धा समाप्त न हो और हमारे पास देने को बहुत सा धन हो। हमारे पास विपुल अन्न हो, हमारे पास बहुत से अतिथि आयें। अन्य लोग हमसे याचना करने वाले हों और हम किसी से याचना नहीं करें।

भारतीयों की यही आशीर्वाद प्राप्त करने की इच्छा रहती है। व्यवहार रूप से भारतवर्ष की यही नीति मानी गई है। यह देश अन्न और धन से अपने देश के तथा दूसरे देश के लोगों की उदर पूर्ति करता है, भरण पोषण करता है। भरण पोषण करने के कारण और ऐसा स्वभाव होने के कारण यह देश भारत नाम से प्रसिद्ध है।

इस प्रकार १. वैदिक मत में ‘विज्ञान पक्ष’ के अनुसार अग्नि विशेष को भारत माना गया है और इससे पालित-पोषित होने के कारण यहाँ के मनुष्य भारत कहे गए, २. पौराणिक मत में इसके ‘इतिहास पक्ष’ के अनुसार ऋषभ पुत्र भरत और शकुन्तला पुत्र भरत के कारण राष्ट्र का नाम भारत पड़ा है। और ३. लोकमत में यहाँ के जन ‘व्यवहार’ में विश्व मात्र के प्रति भरण-पोषण की भावना होने के कारण यह राष्ट्र भारत नाम से जाना गया।

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