रुद्राणां शङ्करश्चास्मि

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वैदिक देवों में रुद्र एक प्रमुख देवता हैं। यद्यपि ऋग्वेद में रुद्र के लिये अलग से तीन सूक्त (१.११४; २.३३ और ७.४६) ही मिलते हैं; तथापि अथर्ववेद और यजुर्वेद की तो सभी संहिताओं में रुद्राध्याय अलग से आता है। यथा तै० सं० ४.५; ४.७; वा० सं १६; अथर्ववेद ११.२ आदि।

ब्राह्मणों में ‘यदरोदीत्तस्माद् रुद्रः’ ६.१.३.१०; ‘अग्नि-र्वै रुद्रः’ ५.३.१.१० – शतपथ ब्राह्मण, तां० ब्रा० १.१.५.८-९; गो० ब्रा० १.५.१५; तै० ब्रा० ३.३.९.७ आदि।

रुद्र का स्वरूप :

वैदिक शास्त्रों के अनुसार रुद्र का स्वरूप युवक का है (ऋग्वेद २.३३.११ एवं ५.६०.५) जो अत्यन्त तेज युक्त है यथा ‘त्वेषं रूपं तपसा निह्ववामहे’ – ऋग्वेद १.११४.५। और उसी प्रकार चमकता है जैसे सूर्य अथवा स्वर्ण। (यः शुक्र इव सूर्यो हिरण्यमिव रोचते – ऋग्वेद १.४३.५) स्वर्ण से इनका विशेष सम्बन्ध है, सोने के आभूषणों को पहनने के कारण ही इनका शरीर दीप्तिमान् दिखाई पड़ता है, यथा ‘शुक्रेभिः पिपिशे हिरण्यैः’ – ऋग्वेद २.३३.९।

रुद्र के वाहन और शस्त्र :

रुद्र का वाहन रथ है और धनुष तथा बाण इनके शस्त्र हैं (‘तमु ष्टुहि यः स्विषुः सुधन्वाः’ – ऋग्वेद ५.४२.११ तथा  ‘अहं रुद्राय धनुरा तनोमि’ – १०.१२५.६)। वाजसनेयी संहिता ३.६१ (अवततधन्वा पिनाकावसः) में रुद्र के धनुष का नाम ‘पिनाक’ वर्णित है।

रुद्र का आवास :

रुद्र का विशेष आवास पर्वतों पर माना जाता है। यजुर्वेद की शतरुद्रीय में उनके लिये गिरीशंत, गिरित्र, गिरिचर, गिरिश तथा गिरिशय विशेषण आते हैं, भगवान शिव का निवास भी कैलाश ही माना जाता है।

रुद्र का अर्थ :

‘रुजं दुःखं द्रावयतीति रुद्रः’ – जो सम्पूर्ण दुःखों से मुक्त करा दें वह रुद्र हैं। रुद्र देवों के क्रोध तथा उनसे होने वाले संकटों को भी दूर करते हैं (‘आरे अस्मद् दैव्यं हेलो अयस्तु’ – ऋग्वेद १.११४.४)। ‘शम्’ (कल्याण) तथा ‘मयस्’ (सुख) के वे कर्ता हैं (ऋ० १.४३.६)। इसीलिये उनको वाजसनेयी संहिता आदि में शंकर एवं मयस्कर कहा गया है। तं ब्रा० २.२.५.५ का कथन है कि जो ‘शिव’ है वही ‘मय’ भी है (यद्वै शिवं तन्मयः)। संसार की सभी औषधियों पर उनका अधिकार है (‘यो विश्वस्य क्षयति भेषजस्य’ ऋ० ५.४२.११)। उनके पास सहस्रों औषधियां हैं (‘सहस्रं ते स्वपिवात भेषजा’ – ऋ० ७.४६.३)। अपने स्तोताओं के लिये वे इन्हें हाथ में लिये रहते हैं (ऋ० १.११४.५) और इन औषधियों का उपयोग करके मनुष्य सौ वर्षों तक जीवित रह सकता है (‘त्वा दत्तेभी रुद्र शन्तमेभिः शतं हिमा अशीय भेषजेभिः’ – ऋ० २.३३.२)। यही कारण है कि रुद्र को ‘सभी वैद्यों में श्रेष्ठ’ की उपाधि दी गई है (‘भिषक्तमं त्वां भिषजां शृणोमि’ – ऋ० २.३३.४)।

मत्स्य पुराण रुद्र शब्द को दो धातुओं से सम्बन्धित करता है, रुद् तथा दुद्रु (गतौ, भागना) से। ब्रह्मा की कामरूपिणी पत्नी ब्रह्माणी सुरभि (गौ) का रूप धारण करके उनके पास गई। उसमें उन्होंने रुद्रों को उत्पन्न किया जो रोते हुए और पितामह की निन्दा करते हुए इधर-उधर भागने लगे –

ते रुदन्तो द्रवन्तश्च गर्हयन्तः पितामहम् ।
रोदनाद द्रवणाच्चैव रुद्रा इति ततः स्मृताः ।
– मत्स्य० १७०.३८

वायुपुराण (९.८२) भी रुद्रों की बिलकुल यही व्युत्पत्ति देता है ।

महाभारत (शान्तिपर्व २८४) में दक्ष शिव की स्तुति करते हुए कहते हैं कि ‘रु’ संकट को कहते हैं और उसको ‘दूर करने’ (द्रावण = भगाना) के कारण आपका नाम रुद्र है । इसी प्रकार ऋ० वे० १.११४.१ तथा २.१.६ की व्याख्या में सायण ने भी रुद् का अर्थ ‘कष्ट’, ‘दुःख’ लेकर रुद्र का अर्थ ‘कष्ट का अपनोदन करने वाला’ लिया है।

रुद्र और अग्नि :

तैत्तिरीय संहिता में अग्नि को ही रुद्र कहा गया है (‘रुद्रो वा एष यदग्निः’  – ५.४.३)। शतपथ ब्राह्मण में भी अनेक स्थानों पर स्पष्ट शब्दों में अग्नि को ही रुद्र कहा गया है – यो वं रुद्रः सो अग्निः (५.२४.१३), अग्निवें रुद्रः (५.३.१.१०)। इसी ब्राह्मण में एक अन्य स्थान पर (१.७.३.८) अग्नि के विषय में जो शब्द कहे गये हैं उनसे रुद्र का स्वरूप स्पष्ट रूप से भासित हो जाता है। इसके अनुसार – अग्नि के ही शर्व तथा भव ये दो नामान्तर हैं। अग्नि को ‘शर्व’ पूरब के लोग कहते हैं और ‘भव’ पश्चिम के। किन्तु ये अग्नि के भयंकर रूप के वाची हैं। उसके सबसे शान्त रूप को अग्नि कहा जाता है जो ‘स्विष्टकृत्’ (मंगलमय, अभीष्ट पूर्ण करने वाला) है।

अग्निर्वै स देवः। तस्यैतानि नामानि शर्व इति यथा प्राच्या आचक्षते। भव इति यथा बाहीकाः। पशूनां पती रुद्रः अग्निरिति। तानि अशान्तानि एव इतराणि नामानि। अग्निरित्येव शान्ततमम्। तस्माद् अग्नय इति क्रियते स्विष्टकृत् इति।
– श० ब्रा० १.७.३.८

अग्नि को रुद्र मानने की धारणा वस्तुतः वेदों से ही प्रारम्भ हुई है। इस सम्बन्ध में ऋग्वेद २.१.६ की ऋचा महत्वपूर्ण है –

“त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे”। 

इस ऋचा में अग्नि को रुद्र के अतिरिक्त ‘असुर’, ‘मरुतों का गण’ तथा ‘पुष्टिकारक’ कहा गया है जो क्रमशः रुद्र के ‘ईशान’ ‘मरुत्पिता’ आदि विशेषणों तथा जल एवं ओषधियों से उनके सम्बन्ध का परिचायक है। इसकी व्याख्या में सायणाचार्य लिखते हैं कि रुद् (दुःख) को दूर करने (द्रावण) के कारण ही अग्नि को रुद्र कहते हैं।

उपर्युक्त उद्धरणों में यद्यपि अग्नि के सामान्य रूप को ही रुद्र कहा गया है किन्तु प्रतीत होता है कि रुद्र के स्वरूप के साथ अग्नि का माध्यमिक अथवा अन्तरिक्षस्थानीय रूप (विद्युत्) ही विशेष रूप से सम्बद्ध था। पार्थिव एवं आकाशीय अग्नि (सूर्य) तो अपेक्षाकृत कम हानिप्रद सिद्ध हो सकते हैं किन्तु अन्तरिक्ष से गिरने वाली तडित् प्रायः पशुओं और मनुष्यों के जीवन के लिये घातक होती है अतः रुद्र का विशेष सम्बन्ध उसी से था। तडित् से सम्बन्धित होने पर उससे अनिवार्यतया सम्बन्धित तीक्ष्ण हिममय झंझावात, वृष्टि तथा मरुद्गण से रुद्र का सम्बन्ध होना आवश्यक ही था। पीछे कुछ ऐसे ऋग्वैदिक मंत्रों का उल्लेख किया गया है (यथा ७.४६.३) जिनमें रुद्र से अपनी विद्युत् रूपी हेति या वज्र को अन्यत्र गिराने की प्रार्थना की गई है। रुद्र का अग्नि तथा विद्युत् से सम्बन्ध महाभारत एवं पुराणों को भी विस्मृत नहीं हुआ। अग्नि और रुद्र के तादात्म्य के अनेक संकेत ग्रन्थों में स्थान-स्थान पर प्राप्त होते हैं, उदाहरणार्थ महाभारत, अनु० ६०.३८,४६; वायुपुराण २१.७५ तथा ३१.२३; विष्णुपुराण ६.३.२४ आदि।

रुद्र और त्र्यम्बक (अम्बक) :

शुल्क यजुर्वेद में रुद्र का ‘त्र्यम्बक’ विशेषण प्राप्त होता है। महामृत्युञ्जय मंत्र “त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्” प्रसिद्ध है।

अम्बा का एक अर्थ है माता। अतः इस शब्द का मूल अर्थ ‘तीन माताओं वाला’ (तिस्रः अम्बाः यस्य) प्रतीत होता है। ऋग्वेद में पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा आकाश, अग्नि के ये तीन जन्मस्थान (माताएँ) माने गये हैं। अतः बहुत सम्भव है कि यह विशेषण मूलतः अग्नि को सूचित करता रहा हो और बाद में अग्नि और रुद्र के ताद्रूप्य के कारण रुद्र से सम्बन्धित हो गया हो। किन्तु अम्बक शब्द का एक अर्थ नेत्र भी होता है अतः धीरे-धीरे रुद्र के इस विशेषण से उनके तीन नेत्र की धारणा परवर्ती काल में विकसित होती चली गई। परवर्ती साहित्य में शिव के ये तीन नेत्र सूर्य, चन्द्र तथा अग्निमय बताये गये हैं।

त्र्यम्बक होम में रुद्र का जो भयंकर स्वरूप है, अम्बिका की उदारता और कल्याणकारिता उसे सन्तुलित करती है। रुद्र से संबन्धित अग्नि की प्रदक्षिणा करते हुए अम्बिका से पति की याचना करना शिव और अम्बिका के विशेषरूप से घनिष्ठ संबन्ध को सूचित करता है। यही कारण है कि ये अंबा या अम्बिका नामक देवी परवर्ती युग में गौरी के रूप में शिव की पत्नी हैं। पुराणों में शिव ‘अम्बिकाभर्ता’ हैं –

अचिन्त्यायाम्बिकाभत्रे सर्वदेवस्तुताय च ।
अभिगम्याय कामाय सद्योजाताय वै नमः ॥
– पद्म पुराण, सृष्टिखण्ड ३५.१४४

वा०सं० ३.६० में रुद्र के विषय में जो ‘त्र्यम्बकं यजामहे’ आदि (मृत्युञ्जय) मंत्र प्राप्त होता है उसमें ही थोड़ा सा परिवर्तन करके श० ब्रा० में उसे कुमारियों की पति-प्राप्ति के लिये विनियुक्त और उपयुक्त कर लिया गया है –

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनाद् इतो मुक्षीय मामुतः ॥
– शतपथ ब्राह्मण २.६.२.१४

आज भी हमारे यहाँ हिन्दू समाज में कन्या के विवाह संस्कार के एक दिन पूर्व अम्बिकापूजन, मातृपूजन या मातृकापूजन का विधान इसे अधिक पुष्ट करता है।

रुद्र गणपति और उनके गण :

प्राच्य साहित्यों से यह पता चलता है कि रुद्र को गणपति भी कहा जाता है। रुद्र के असंख्य गण हैं और उनका अधिपति होने के कारण रुद्र गणपति कहे गये हैं। शतरुद्रीय में ही ‘नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च’ – (मन्त्र २५) कहकर रुद्र और उनके गणों – दोनों की वन्दना कि गई है।

मत्स्य पुराण, अध्याय १५४ में विवाहोपरान्त घर आयी हुई पार्वती शिव के गणों को देखती हैं और उत्सुकतावश शिव से पूछती हैं –

गणेशाः कति संख्याताः किनामानः किमात्मकाः ।
एकैकशो मम ब्रूह्यधिष्ठिता ये पृथक् पृथक् ॥
– श्लोक ५३८

इस पर शिव उत्तर देते हैं कि ये गण करोड़ों की संख्या में हैं, इनकी गणना भी नहीं की जा सकती। सारा संसार इनसे भरा हुआ है। तीर्थों में, सड़कों पर, जीर्ण भवनों में, प्राचीन वृक्षों पर तथा दानवों के शरीर आदि में सर्वत्र ये विद्यमान रहते हैं। इनका आहार भी अनेक प्रकार का है। कोई अग्नि पान करते हैं, कोई जल का फेन, कोई धूम, कोई मधु, कोई रक्त और कोई केवल वायु-भक्षण करके जीवित रहते हैं। ये इतने विविध कर्म और गुण वाले हैं कि उनका वर्णन नहीं किया जा सकता –

कोटिसंख्या ह्यसंख्याता नाना विख्यातपौरुषाः ।
जगदापूरितं सर्वैरेभिर्भीमे महाबलेः ॥
सिद्धक्षेत्रेषु रथ्यासु जीर्णोद्यानेषु वेश्मसु।
दानवानां शरीरेषु बालेषून्मत्तकेषु च ॥
एते विशन्ति मुदिता नानाहार विहारिणः।
ऊष्मपाः फेनपाश्चैव धूमपा मधुपायिनः ॥
रक्तपाः सर्वभक्षाश्च वायुपा ह्यम्बुभोजनाः।
गेय नृत्योपहाराश्च नाना वाद्यरवप्रियाः ॥
न ह्येषां वै अनन्तत्वाद् गुणान् वक्तुं हि शक्यते।
 – मत्स्य पुराण, अध्याय १५४ श्लोक ५३९ से ४२

वायुपुराण के एक उल्लेख से यह निर्विवाद रूप से सिद्ध है कि पुराणों में वर्णित ये ही रुद्रगण शतरुद्रियसूक्त में रुद्राः नाम से विख्यात हैं। दशम अध्याय में एक कथा आती है (श्लोक ४५-६२) कि ब्रह्मा जी ने एक बार नीललोहित – महादेव से सृष्टि करने के लिये कहा। इस पर महादेव जी ने अपने समान गुण और स्वभाव वाले अमर मानसपुत्रों को उत्पन्न किया। ये सभी चर्म (ढाल) धारण किये हुए थे तथा हरितकेश, क्रूर दृष्टि और कपालधारी थे; इनके कई हाथ, मुख तथा नेत्र थे आदि। इस रौद्रसृष्टि को देखकर ब्रह्माजी घबराये और उनसे सौम्य तथा मरणशील सृष्टि करने के लिये कहा। शिव ने कहा, ऐसी प्रजा उत्पन्न करना हमारे वश का नहीं है। यह काम आप ही कीजिये। पर “हमने जो इन नीललोहित और विरूप जीवों को उत्पन्न किया है ये महाबली देवगण भूलोक और अन्तरिक्ष में रुद्र नाम से प्रसिद्ध होकर यज्ञीय देवों के मध्य परिगणित होंगे एवं शतरुद्र नाम से विख्यात होकर यज्ञ-भाग का भोग करेंगे।”

महाभारत शान्तिपर्व (२८४.६०-१८२) में दक्ष, शिव की स्तुति करते हुए, जीर्ण-शीर्ण घरों, पुराने-वृक्षों तथा चौराहों पर रहने और विचरण करने वाले रुद्रों को नमस्कार करते हैं। ये ‘रुद्र’ शिव के गण के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। वायुपुराण ५४.२५-३० तथा ६९.२४०-२५६, स्कन्दपुराण, काशीखंड, ५३.८-१२, वराह पुराण १०.४४-५० आदि में भी शिव के इन गणों का विशेष वर्णन है।

रुद्र की प्रधानता :

श्वेताश्वरोपनिषद् ३.२ में कहा गया है कि एकमात्र रुद्र ही इस संसार को अपनी शक्ति से संचालित करते हैं। वे संसार के प्राणियों की सृष्टि करते हैं, रक्षा करते हैं तथा अन्त में संहार भी करते हैं। वे सबके अन्दर व्याप्त हैं –

एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः य इमांल्लोकानीशत ईशनीभिः ।
प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति, संकोचान्तकाले, संसृज्य विश्वा भुवनानि, गोपाः ॥

यही नहीं, वे सम्पूर्ण देवों की भी उत्पत्ति एवं अस्तित्व के हेतु हैं। उन्होंने ही हिरण्यगर्भ रूपी प्रजापति को आदि में उत्पन्न किया था –

यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वा धियो रुद्रो महषः ।
हिरण्यगर्भ जनयामास पूर्व स नो बुद्धया शुभया संयुनक्तु ॥
– श्वेताश्वरोपनिषद् ३.४

रुद्र के प्राचीन ईश विशेषण ने भी उनके इस औपनिषदिक उत्कर्ष में पर्याप्त सहयोग दिया। ३.७ में कहा गया है कि ईश (रुद्र) महान् एवं उत्कृष्ट परब्रह्म हैं, उन्हें जान लेने पर मनुष्य अमर हो जाता है।

ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम् ।
विश्वस्यैक परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वा अमृता भवन्ति ॥
– श्वेताश्वरोपनिषद् ३.७

उनके सब ओर मुख, सिर तथा ग्रीवा हैं, वे सम्पूर्ण प्राणियों की हृदय- गुहा में वर्तमान हैं, वे सर्वगत तथा सर्वव्यापी हैं –

सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः ।
सर्वव्यापी स भगवान् तस्मात् सर्वगतः शिवः ॥
– श्वेताश्वरोपनिषद् ३.११

श्वेताश्वरोपनिषद् ३.१४ तथा ३.१५ में ऋग्वेदीय पुरुषसूक्त (१०.९०) के दो मन्त्र (सहस्रशीर्षा…, पुरुष एवेदं… ) उद्धृत करके ऋग्वेद के यज्ञ-पुरुष से शिव का तादात्म्य किया गया है। ४.१० में कहा है कि महेश्वर रुद्र माया के अधिपति हैं ‘मायां तु प्रकृति विद्यात मायिनं तु महेश्वरम्’। और आगे पुनः (४.१६) यह उपनिषद् शक्तियुक्त शब्दों में कहता है कि ‘सब भूतों में सूक्ष्म रूप से प्रविष्ट और संसार को परिव्याप्त कर लेने वाले शिव को जान कर मनुष्य सब बन्धनों से छूट जाता है’।

रुद्र का एकादशत्व :

यद्यपि वैदिक साहित्य में सर्वत्र रुद्रों के एकादशत्व का उल्लेख किया गया है (यथा ऐ० ब्रा० १.२.४) किन्तु कहीं भी उनके नामों का उल्लेख नहीं हुआ । श० ब्रा० ११.६.३.७ ने दश प्राणों एवं आत्मा को एकादश रुद्र कहा है क्योंकि शरीर निकलते समय ये सम्बन्धियों को रुलाते हैं (रोदयन्ति)। वायुपुराण के २५वें अध्याय के २१वें श्लोक में भी प्राणों को रुद्र कहा गया है। हमने ऊपर देखा कि ब्राह्मण ग्रन्थों में रुद्र एवं रुद्रगण में स्पष्ट पार्थक्य किया गया है। किन्तु क्रमबद्ध रूप है, इस कारण इसे देखते हुए रुद्र के नाम का वर्णन साहित्य में आवश्यक समझा गया।

एकादश रुद्र के नाम :

श्रीमद्भागवत ३.१२. १-२० में आई एक कथा में कहा गया है कि एक बार ब्रह्माजी को क्रोध आया जिससे उनकी भृकुटी से एक नीललोहित कुमार का जन्म हुआ। वह रोने लगे और ब्रह्माजी से उन्होंने नाम रखने तथा रहने के स्थान बताने की प्रार्थना की। ब्रह्मा ने उनके मन्यु, मनु, महिनस, महान्, शिव, ऋतुध्वज, उग्ररेता, भव, काल, वामदेव तथा धृतव्रत – ये ग्यारह नाम रखे तथा क्रमशः हृदय, इन्द्रियाँ, प्राण, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र तथा तप रहने के स्थान बताये। इस कथा में रुद्र की अष्टमूर्ति वाली कथा से थोड़ा सा परिवर्तन करके एकादश रुद्रों का शिव से ही तादात्म्य कर दिया गया है।

विष्णु पुराण ११.७.१२-१५ से भी एकादश रुद्र एक ही शिव के विभिन्न रूप प्रतीत होते हैं। क्रोधाविष्ट ब्रह्माजी के ललाट से ऐसे प्राणी का जन्म हुआ जिसका आधा शरीर पुरुष का था, आधा स्त्री का। ब्रह्माजी ने उसे अपने शरीर को विभाजित करने की आज्ञा दी। तब उसने अपने पुरुष शरीर को एकादश भागों में विभक्त किया और स्त्री-शरीर को सौम्य तथा असौम्य आदि कई रूपों में –

भृकुटीकुटिलात् तस्य ललाटक्रोधदीपितात् ।
समुत्पन्नस्तदा रुद्रो मध्याह्लार्कसमप्रभः ॥
अर्धनारीनरवपुः प्रचण्डोऽतिशरीरवान् ।
‘विभजात्मान’ मित्युक्त्वा तं ब्रह्मान्तर्दधे ततः ॥
बिभेद पुरुषत्वं च दशधा चंकधा पुनः ।
सौम्यासौम्यैस्तदाशान्ताशान्तैः स्त्रीत्वं च स प्रभुः ॥

बिल्कुल यही कथा वायुपुराण के नवम अध्याय में भी प्राप्त होती है।

एकादश रुद्रों की कथा न केवल महाभारत और पुराणादि में वर्णित है, अपितु उनका उल्लेख ऋग्वेदादि में भी मिलता है। एकादश रुद्रों की विभूति समस्त देवताओं में विद्यमान है। एकादश रुद्रों के नाम क्रमशः – १. शम्भु २. पिनाकी ३. गिरीश ४. स्थाणु ५. भर्ग ६. सदाशिव ७. शिव ८. हर ९. शर्व १०. कपाली तथा ११. भव हैं।

अनन्त/असंख्य रुद्र :

एक ओर ग्यारह अथवा कहीं-कहीं बारह रुद्रों का वर्णन मिलता है तो वहीं मत्स्य पुराण में (५.२९-३२) कहा गया है कि रुद्रों की संख्या ८४ करोड़ है जिनमें ११ रुद्र प्रधान अथवा गणेश्वर हैं।

श्रीमद्भागवत ६.६.१७, १८ में भी रुद्रों की संख्या करोड़ों में मानी गई है। जिनमें ग्यारह प्रमुख हैं— रैवत, अज, भव, भीम, वाम, उग्र, वृषाकपि, अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, बहुरूप तथा महान्

वायु पुराण के ६६ वें अध्याय में ये नाम अंगारक, सर्प, सदस्पति, अजैकपात्, अहिर्बुध्न्य, ऊर्ध्वकेतु, ज्वर, भुवन, मृत्यु, कपाल, निर्ऋति तथा ईश्वर (शिव) हैं।

रुद्रों में शिव की प्रधानता शास्त्रों में सिद्ध है। श्रीमद्भगवद्गीता १०.२३ में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा – “रुद्राणां शङ्करश्चास्मि” मैं रुद्रों में शंकर हूँ।

शिव पूजन का महत्व :

स्कन्दपुराण, श्रावणमासमाहात्म्य में कहा गया है –

एकस्य तेऽर्चनाद्देव पञ्चायतनपूजनम् ।
जायतेऽन्यसुरे चैव सम्भवेन्न हि सर्वथा ॥

अर्थात् हे देव! एक मात्र आपकी पूजा से पञ्चायतन (पञ्चदेव) पूजा हो जाती है जो कि दूसरे देवता कि पूजा से किसी भी प्रकार से सम्भव नहीं है।

स्वयं शिवस्त्वं वामोरौ शक्तिर्गणपतिस्तथा ।
दक्षिणोरावक्ष्णि सूर्यो हृदये भक्तराङ्करिः ॥
अन्नस्य ब्रह्मरूपत्वाद्रसात्मत्वाद्धरेरपि ।
भोक्तृत्वाच्च तवेशान श्रेष्ठत्वे कस्य संशयः ॥

आप स्वयं शिव हैं। आपकी बायीं जाँघ पर शक्तिस्वरूपा देवी, दाहिनी जाँघ पर गणपति, आपके नेत्र में सूर्य तथा हृदय में भक्तराज भगवान् श्रीहरि विराजमान हैं। अन्न के ब्रह्मरूप होने तथा आपके उसका भोक्ता होने के कारण हे ईशान! आपके श्रेष्ठत्व में किसे सन्देह हो सकता है।

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Alok Ranjan
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1 year ago

Adbhut lekh hai.

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