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Tuesday, June 15, 2021
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    समर्पण

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    एक विचार
    एक विचार
    स्वतंत्र लेखक, विचारक

    पढने में समय: 4 मिनटसमर्पण दो शब्दों से मिल कर बना है, ‘सम’ और दूसरा ‘अर्पण’ अर्थात ‘अपने मन का अर्पण’। मन का मतलब चाहतें, आकांक्षाएं, इच्छाएं। समर्पण स्वयं में एक संपूर्ण शब्द है, कुछ लोग अध्यात्म में इसे ‘आत्म-समर्पण’ भी कहते हैं लेकिन अर्थ समान ही रहता है क्योंकि तब व्यक्ति, व्यक्ति न हो कर ‘आत्मा’ से सम्बोधित होता है। शरणागति, श्रद्धा, विश्वास, प्रेम यह सब समर्पण के ही प्रकार हैं। यहाँ एक बात अवश्य जानने वाली है कि घुटना टेकना समर्पण नहीं है। हारने का नाम समर्पण नहीं है, कमज़ोर हो जाने का नाम समर्पण नहीं है। समर्पण का अर्थ है, ‘’मैंने अपनी कमज़ोरी को समर्पित किया; अब मेरे में मात्र बल शेष है।’’

    सम्पूर्ण समर्पण के भाव को ही ‘प्रेम’ कहते हैं। यदि यह सवाल उठे कि आखिर सच्चा प्यार क्या है? तो जवाब में हजारों तर्क दिए जा सकते हैं, जो सभी अपनी जगह सही भी होंगे, मगर यदि इन तर्कों का सार निकाला जाए तो वह है ‘संपूर्ण समर्पण भाव’; जहाँ मेरे ‘मैं’ का नाश हो जाता है और सब कुछ तेरा ‘तूँ’ शेष रहता है। अर्थात मेरा व्यक्तित्व अब मेरा नहीं रह जाता।

    विशुद्ध प्रेम वही है जो प्रतिदान में कुछ पाने की लालसा नहीं रखता। आत्मा की गहराई तक विद्यमान आसक्ति ही सच्चे प्यार का प्रमाण है। वास्तव में तो प्यार तभी तक प्यार है जब तक उसमें विशालता व शुद्धता कायम है।