सरजू सरि कलि कलुष नसावनि

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भगवान श्रीराम – हे महाभाग! इस सरयू नदी का इतना श्रेष्ठ माहात्मय क्यों है और यह कहाँ से धरातल पर आई है?

मुद्गल ऋषि – हे प्रभो! आप अपना ही चरित्र मुझसे सुनना चाहते हैं। सुनिए, पहले एक शंखासुर नामक राक्षस सब वेद हर ले गया। उसने वेदों को समुद्र में डुबो दिया और स्वयं उसी महासागर में छुप गया। उसको मारने के लिए आपने भारी मत्स्य का रूप धारण किया। शंखासुर को मारकर, वेदों को लाकर आपने ब्रह्माजी को दिया। प्रसन्नतापूर्वक पुनः अपना पूर्वरूप धारण कर लिया, उस समय आपके नेत्रों से आनंदाश्रु की बूँदें टपक पड़ीं।

हिमालय पर गिरी हुई आप नारायण के उन हर्ष अश्रु की बूँदों ने एक पवित्र तथा निर्मल जल वाली नदी का रूप धारण कर लिया। आगे चलकर वे कासार (झील) और कासार से मानसरोवर के रूप में परिणत हो गईं।

उसी समय आपके पूर्वज महात्मा वैवस्वत मनु ने यज्ञ करने की इच्छा करके अपने गुरु से कहा – “इस अयोध्यापुरी के अनादिकाल से स्थित रहने पर भी मैंने अपने निवास के लिए इसकी कुछ विशेषतापूर्वक रचना करवाई है। इस कारण यदि आप कहें तो मैं इस नगरी में यज्ञ करुँ”। गुरु ने कहा – “न यहाँ कोई तीर्थ है, और न कोई बड़ी नदी है। यदि आपको यहीं यज्ञ करने की इच्छा है तो मानसरोवर से सुंदर तथा पापों को नष्ट करने वाली एक नदी यहाँ ले आइए”। गुरु के वचन को सुनकर महान राजा वैवस्वत मनु ने अपने विशाल धनुष को चढ़ाया तथा टंकार करके बाण चलाया। वह बाण मानसरोवर को भेद कर उसमें से निकली नदी के आगे-आगे चलकर रास्ता दिखाते हुए अयोध्या ले आया। बाण के मार्ग का अनुसरण करते हुए वह नदी अयोध्या आयी तथा वहाँ से आगे चलकर पूर्वी महासागर में मिल गई।

‘शर’ के द्वारा लायी जाने से लोग उसको ‘शरयू’ नदी कहने लगे। अथवा सरोवर से निकलकर आने के कारण उसका ‘सरयू’ नाम पड़ा, कुछ लोगों का ऐसा कथन है (नदी पुनीत सुमानस नंदिनि)।

इसके बाद आपके पूर्वज ‘भगीरथ’ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए आपके चरणारबिन्द से प्रादुर्भूत भागीरथी गंगा को ले आए। बाद में भगवान शंकर को तप से प्रसन्न करके उस नदी को सरयू से ला मिलाया। शंकर भगवान के वरदान से गंगा नदी की बड़ी भारी प्रसिद्धि हुई तथा समुद्र तक उसको लोग गंगा कहने लगे।

भगवन आपके चरणकमलों से निकली हुई गंगा समस्त विश्व को पवित्र करने लगी। वैसे ही आपने नेत्रजल से उत्पन्न होकर यह सरयू लोगों को पावन करने लगी। करोड़ों वर्षों में भी इस सरयू नदी की महिमा का वर्णन कोई नहीं कर सकता।

दरस परस मज्जन अरु पाना।
हरइ पाप कहि बेद पुराना॥
नदी पुनीत अमित महिमा अति।
कहि न सकइ सारदा बिमल मति॥

– रामचरितमानस, बालकाण्ड

अर्थात वेद-पुराण कहते हैं कि सरयू का दर्शन, स्पर्श, स्नान और जलपान पापों को हरता है। यह नदी बड़ी ही पवित्र है, इसकी महिमा अनंत है, जिसे विमल बुद्धि वाली सरस्वती भी नहीं कह सकतीं।

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Asit Rai
A.Rai
4 months ago

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