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Monday, May 16, 2022

रहमत का सबब

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Satyendra Tiwari
Satyendra Tiwari
न कविवर हूँ न शायर हूँ। बस थोड़ा-बहुत लिखा करता हूँ। मन में आए भावों को, कभी गद्य तो कभी पद्य में व्यक्त किया करता हूँ।
पढने में समय: < 1 मिनट

बा वफ़ा चरागों ने न की होती

रौशनी रौशन कभी न होती

शमा से कोई तो पूछो

आंधियों ने दिए हैं कितने जख्म

बेचारी जल भी कहाँ पाती

ग़र मंजूर ए खुदा न होता

***

ख़ैर है ख़ुदा की रहमत बख्श दी उसने

शब ए गम में भी एक खुशी है

कि वो महफूज़ है कहीं भी

वर्ना जिस्म मेरा बेजान भी न होता

***

राज ए रंग ए हिना राज ही रह जाती

वो अहसान फरामोश ग़र न होती

कोई नासमझ तिवारी शायर भी न होता

***

Written by — सत्येन्द्र  तिवारी

अस्वीकरण: प्रस्तुत लेख, लेखक/लेखिका के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो। उपयोग की गई चित्र/चित्रों की जिम्मेदारी भी लेखक/लेखिका स्वयं वहन करते/करती हैं।
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न कविवर हूँ न शायर हूँ। बस थोड़ा-बहुत लिखा करता हूँ। मन में आए भावों को, कभी गद्य तो कभी पद्य में व्यक्त किया करता हूँ।
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