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Tuesday, October 19, 2021

जातियों का राजनीति शास्त्र

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Dhananjay Gangay
Dhananjay Gangay
Journalist, Thinker, Motivational speaker, Writer, Astrologer🚩🚩
पढने में समय: 6 मिनट

भारत में जातियां हकीकत हैं, यह सामाजिक सामाजिकता का ताना – बाना बुनते हुए समाज को बहुत अंदर तक प्रभावित करती हैं।

शब्द ब्युत्पत्ति की दृष्टि से देखें तो जाति शब्द संस्कृत की ‘जनि’ (जन) धातु में ‘क्तिन’ प्रत्यय लगाकर बना है। न्याय सूत्र के अनुसार ‘जाति’ समान जन्म वाले लोगों को मिलाकर बनती है।

व्याकरण के अनुसार जाति की परिभाषा है जो आकृति के द्वारा पहचानी जाय, लिंगो के साथ न बदल जाय और एक बार बोलने से जान ली जाय।

वेदों ने चार वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की उत्पत्ति का सिद्धांत दिया लेकिन यह विभाजन एक ही पुरुष का था अर्थात मूल वही है स्वरूप के स्तर पर भेद है। वर्ण के स्तर पर सभी समान हैं यह स्तरीकरण समाज को गति देने के लिए है।

भारतीय शास्त्र आपस्तंभ सूत्र, याज्ञवल्कय स्मृति, परसराम स्मृति, महाभारत आदि में 64 प्रकार के व्यवसायों का उल्लेख है। उन व्यवसायों और क्षेत्र विशेष, कार्य विशेष के आधार पर वर्ण के अंतर्गत ही जाति का नाम दिया गया था लेकिन यह वर्ण से भिन्न नहीं था। शुरू में पेशा बदला जा सकता था लेकिन समय के साथ परिवार उस पेशे के विशेषज्ञ हो गये। यथा कारीगर, शिल्पकार, रंगरेज, बुनकर, जुता बनाने वाला। कार्य की विशेषता को सुरक्षित करने के लिये उन्हें जो नाम दिया गया बाद में उन्होंने जाति का नाम ले लिया जैसे चमड़े का काम करने वाले चर्मकार, लोहे का काम करने वाले लुहार, नक्कासी करने वाले शिल्पकार आदि।

सबसे प्रमुख समस्या कि जातियों में श्रेष्ठता (उंच-नीच, छूत-अछूत) की भावना कैसे विकसित हो गई?

किसी ने स्वच्छता को आधार बनाकर यह बात कही। सही है क्योंकि यह हमारे स्वास्थ्य का आधार है जो लोग स्वच्छ तरीके से नहीं रहते हैं उन्हें तरीका बताया जाय न कि उन्हें अस्पर्श घोषित कर दिया।

प्रत्येक मनुष्य को गरिमय जीवन जीने का प्राकृतिक, नैतिक और धार्मिक स्तर पर अधिकार है। कोई भी मानवीय स्तर पर भेद नहीं कर सकता।

समय के साथ वर्ण के अंतर्गत विकसित जाति ने एक बृहद आकर ले लिया। समस्या थी समाज के मूल स्वरूप को बचाने की।

महाभारत और रामायण दोनों से यह साफ होता है कि वर्ण में कोई परिवर्तन न होते हुये आप किसी भी जाति का कार्य कर सकते थे। महाभारत में द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, अश्वत्थामा ब्राह्मण होकर क्षत्रिय का कार्य करते थे। कर्ण सूत होकर क्षत्रिय कार्य करता था।

भारत के पुराण या इतिहास पर गौर करें तो कई वैश्य और शुद्र राजा हुये। व्यवसाय के बदलने से वर्ण परिवर्तन होने लगे तब समाज के नियम कैसे सुरक्षित रहेंगे? व्यक्ति रोज पेशा बदलकर जाति बदलने लगेगा। सामाजिक संरचना कैसे सुरक्षित रहेगी क्योंकि समाज नियम से चलता है जिसे आज संविधान कहा जाता है।

हिन्दू सनातन धर्म पर विचार करें तो श्रीराम निषादराज गुह को गले लगाते और सबरी के बेर खाते हैं वनवासी सुग्रीव, जामवंत, अंगद आदि की मदद लेते हैं। इन्हें अपने राज्यारोहण में भी आमंत्रित कर अपने बगल में स्थान देते हैं।

श्री कृष्ण के समय में महाभारत के युद्ध में सूत कर्ण, बनवासी घटोत्कच या शिखंडी को युद्ध में भाग लेने दिया गया। शम्बूक और एकलव्य की कथा मूल रामायण और महाभारत में नहीं है। यही हाल मनुस्मृति का भी है। जाति व्यवस्था का आरोपण निराधार है।

इतिहासकार अर्नाल्ड जे टायनबी का कहना है कि “विश्व में किसी के इतिहास के साथ सबसे ज्यादा छेड़छाड़ हुई है तो वह है भारत का इतिहास”। वैसे भी भारत का इतिहास अंग्रेजों ने लिखा है जिसके धर्मान्ध होने का सबूत BC (बिफोर क्राइस्ट) और AD का विभाजन ही है। कार्बन डेटिंग तकनीक के विकास के पूर्व ईसाइयों की मान्यता थी कि ईसामसीह से पूर्व मानवता का, विज्ञान का विकास था ही नहीं।

भारत में ईसाई अपने एजेंडे को लागू करने के लिए जातियों को चिन्हित कर उसका राजनीतिक लाभ लेने का दुष्चक्र रचा। 1757 में जब अंग्रेजो ने बंगाल का शासन सम्हाला, उस समय भारत का दुनिया की GDP में 24 फीसदी योगदान था जो:

  • 1800 में 19.6%
  • 1830 में 17.6%
  • 1860 में 8.6%
  • 1900 में 1.7%

और आज 2019 से तुलना करें तब भी 1.7% के लगभग ही है क्योंकि अभी भी लागू तो अंग्रेजी शिक्षा और नीति ही है।

जनसंख्या के अनुपात में यदि अर्थव्यवस्था 17.5% पर पहुँच जाय तो रोजगार के अनेक अवसर विकसित होंगे। दलित, पिछड़ा, अगड़ा, सवर्ण, उच्च, नीच जैसे दायरे में भारतीयों को नहीं भरना पड़ेगा।

भारत के वैभव के स्रोत राजशिल्पी, कृषि, वाणिज्य, शिल्प का विनाश कर ‘दलित’ शब्द गढ़ा गया। ईसाइयों का पूरा ध्यान भारत के धन और वैभव को लूटना था, यहाँ के उद्योग और टेक्नोलॉजी को चुरा कर अपने देश में औद्यगिक क्रांति करनी थी। याद रहे भारत की लूट के बाद ब्रिटेन और अमेरिका ने जिसका 1757 में दुनिया की GDP में मात्र 2% योगदान था उसने भारत का स्थान ग्रहण कर लिया।

ईसाईयों ने भारत को कई स्तर पर तोड़ने की साजिश रची बौद्धिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर। तब भी भारत में धर्म परिवर्तन होते नहीं दिखा, क्योंकि अंग्रेज जहाँ गया वहाँ के मूल निवासियों का धर्म परिवर्तित कर दिया लेकिन भारत में सफलता नहीं मिली।

कास्ट सिस्टम के माध्यम से चार हिन्दू वर्णों वाले समाज को 2000 से अधिक जातियों में चिन्हित कर दिया। अंग्रेजों के लिए मुख्य समस्या भारत का आर्थिक प्रकल्प था जिसका आधार वर्णव्यवस्था थी क्योंकि यही वह स्रोत था जिसने भारत को व्यापार का सिरमौर बनाया था। विश्वभर से सोना चाँदी भारत आकर कैद हो जाती थी। अंग्रेजों को इसे ही तोड़ना था।

1901 की जनगणना में मैक्समूलर ने अच्छी साठ – गांठ की थी। 1901 में रिसले ने मैक्समूलर के आर्यन अफवाह से निर्मित तथाकथित सवर्णों को ऊंची जाति घोषित किया। बाकी अन्य समुदाय को नीची जाति का। जातिगत जनगणना ने 2378 जाति बना कर भारत को 2378 टुकड़े में विभाजित कर दिया। दलित शब्द गढ़ दिया गया।

अंग्रेजों ने अपने प्रचारतंत्र में आर्य – अनार्य (दस्यु) और आर्य – द्रविड़ के संघर्ष को प्रचारित किया। 1830 के बाद आर्य विदेशी थे का सिद्धांत चलाया गया।

सामन्तवाद, ब्राह्मणवाद, समाजवाद, मार्क्सवाद, व्यक्तिवाद, आधुनिकतावाद सब पूंजीवादी उपनिवेशी व्यवस्था को बचाने का प्रयास किया। मार्क्स स्वयं कहता है कि कुटिल अंग्रेज ने भारत की खड्डी और तकली तोड़ डाली, उसे गरीबी के दुष्चक्र में डाल दिया।

भारत के राजशिल्पियों को मजदूर या किसान बनने पर विवश किया गया। 1834 में भारत में गवर्नर जनरल वैटिंग किसानों की लाशों की हड्डियां देख कर कहता है कि किसानों से ‘नील’ इस लिए उगवाई जाती है क्योंकि वह इसे खा नहीं सकता है।

अंग्रेजों ने अपनी नीतियों को सफल करने के लिए भारत में काले अंग्रेज तैयार किये जो मैकाले की स्पष्ट नीति थी। ये काले अंग्रेज नेहरू, अंबेडकर, पेरियार और जिन्ना थे। जिन्होंने अंग्रेजो को ईश्वरीय, आधुनिक, वैज्ञानिक और शिक्षक के रूप में प्रस्तुत किया लेकिन शोषणकारी के रूप में नहीं। इन्होंने सनातनी व्यवस्था को ही दोषी ठहराया। सवर्ण – अवर्ण, ऊँच – नीच और जातियों को ही सच्चाई मान लिया।

आरक्षण का मुख्य उद्देश्य है व्यक्ति को सुदृढ करना, सरकारी नौकरी देना और असमानता को खत्म करना लेकिन आरक्षण की वास्तविक स्थिति देखें तो जरूर कुछ लोग बढ़े हैं लेकिन असमानता की खाई और चौड़ी होने के साथ वैमनस्यता बलवान हो गई है। इन सब के बीच अंग्रेज पाक साफ बना रहा कारण भारत के वह नेता थे जो नया वर्ग/ काले अंग्रेज बनने में ही गर्व कर रहे थे।

आरक्षण का हाल पिछले दिनों दिल्ली के रविदास मंदिर के आंदोलन में देखा गया, कितनी अधिक वैमनस्यता लोगों में एक दूसरे के प्रति बढ़ गयी है। केरल में दलित को थेवर (OBC) जाति ने लाश नहीं ले जाने दिया इसको मीडिया में सवर्ण के द्वारा किया गया कारनामा कहा गया। ऐसी ही कई घटनाओं में फेक न्यूज का सहारा लेकर समाज को तोड़ने का राजनीतिक कुचक्र किया जा रहा है। तुम मेरी मूर्ति तोड़ोगे मैं तुम्हारी मूर्ति तोडूंगा, तुम मुझे गाली दोगों मैं तुम्हें और जोर से गाली दूंगा।

जातियों की स्थिति का आकलन भारत में करते हैं तब मुस्लिम और ईसाइयों में भी कई जातियों का प्रचलन है। केरल में नीची जाति के ईसाइयों के अलग गिरिजाघर हैं। पिछले दिनों एक दलित लड़के को इस लिए मार दिया गया कि वह ईसाई लड़की से प्रेम करता था।

मुसलमान की बात करें तो उसमें भी कई उच्च जातियां खान, पठान, अंसारी, मुगल आदि हैं। बिहार सरकार ने पिछले दिनों 27 मुस्लिम जातियों को पिछड़े वर्ग में आरक्षण देने के लिए शामिल किया था। छुआछूत को भारत में मुस्लिम शासकों द्वारा ही बढ़ावा दिया गया था धर्मांतरण को बढ़ावा देने के लिए। क्योंकि सबसे बड़ी समस्या गरीबी है और गरीब यदि सामाजिक सम्मान से वंचित है तो उसे भड़काकर धर्मांतरित आसानी से किया जा सकता है।

पाकिस्तान और बांग्लादेश में आज भी शुद्र हिन्दू उनके मुसलमानों के कुएं, बावड़ी, नल आदि से पानी नहीं भर सकता है। यह मुस्लिम छुआछूत को इसलिए बना रखे हैं जिससे विवश होकर दुसरे भी मुस्लिम बन जाय। ईसाई और मुस्लिम दोनों एक ही परिवार के हैं। दोनों दूसरे का धर्म परिवर्तन कराने में विश्वास करते हैं।

आरक्षण का मकसद आर्टिकल 15(4) और 16(4) के माध्यम से समानता लाना समाज में पीछे छुटे लोगों को लाभ पहुँचना था लेकिन 72 साल बाद भी किसी जाति का प्रतिनिधित्व पूर्ण नहीं हो पाया। आरक्षण जिसे मिला है उसने इसे अपना अधिकार मान लिया, जिसे नहीं मिला वह पिछड़ा, दलित बनने के लिए संघर्ष कर रहा है। डॉ अंबेडकर ने कहा भी था कि किसी हाल में 10 वर्ष से अधिक आरक्षण का प्रावधान न हो नहीं तो राजनीतिक रोटियां सेकी जायेगी। जो आज सत्य साबित है। नेता को समस्या खत्म होने का एक मात्र विकल्प आरक्षण दिखता है जबकि रोजगार वृद्धि का कोई प्रयास नहीं है।


नोट: प्रस्तुत लेख, लेखक के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो।

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नोट: प्रस्तुत लेख, लेखक के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो।
Note: The opinions expressed in this article are the author’s own and do not reflect the view of the संभाषण Team.

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Dhananjay Gangay
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GEET GOVIND SAHU
GEET GOVIND SAHU
2 years ago

बहुत प्रभावशाली व्याख्या रखी महोदय आपने। इस हेतु धन्यवाद।

इस व्यव्स्था ने तो बड़ी एवं गम्भीर समस्याएँ पैदा कर दी हैं। कई मत पंथ धर्म गुरू नेता इसे भुनाने में लगे हैं। आखिर आप इसका भविष्य किस प्रकार देखते हैं एवं हल क्या सोचते हैं?

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