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Saturday, December 3, 2022

कलयुग की प्रेमगाथा

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Dhananjay Gangey
Dhananjay gangey
Journalist, Thinker, Motivational speaker, Writer, Astrologer🚩🚩
पढने में समय: 5 मिनट

यह समय अंग्रेजी वाले प्रेमियों (लवर) का चल रहा है। GF, BF के बाद प्रचलन में X (Ex) भी आ गया। मेरी X तेरा X, एक वायरस की तरह लवर का प्रचलन फैलता जा रहा है। चरित्र क्या होता है? न BF को पता न GF को। इनका मानना है कि जितने दिन मन कर रहा हो रहो उसके बाद आगे का अपना रास्ता नापो, यहाँ मेरे पास तुम्हारी कहानी के लिए टाइम नहीं है।

लड़की कहती है लौंडा पांच दिन बाद दूसरी ढूढ़ने लगता है तो हम क्यों एक में फंसे रहें? रात – रात भर बातें, चैटिंग, Msg, Video call, ऐसा लगेगा यही धरती का परफेक्ट जोड़ा है। कुछ दिन बीते सेटिंग चेंज, फिर दोनों अलग टेस्ट के लिए दूसरी/दूसरा, तीसरी/तीसरा आगे यह शृंखला कितनी दूर जाये पता नहीं।

टूटते रिश्ते, कमजोर होता व्यतित्व, एक दूसरे को धोखे में रखते लोग, आखिर यह सीख उन्हें अंग्रेजी शिक्षा ने ही दी है। आज इतने अधिक स्वार्थ में अन्धे हुये लोग हैं कि उन्हें अपने ऊपर चिंतन के लिए तनिक समय नहीं है। स्त्री की गरिमा और पुरुष की महिमा को देहसुख के लिए मलिन कर रहे हैं।

आज मेरा इस विषय पर लिखने का उद्देश्य यह है कि आखिर ये सब क्यों चल रहा है? लवर का बार – बार बदलाव भी किस लिए है? कुछ लड़कियां घर से भाग कर अंतर्जातीय शादियाँ कर रही हैं। उन्हें लगता है कि उसके बगैर मर जाएँगी। वास्तविकता यह है कि कुछ अपवादों को छोड़ कर ऐसी शादियों का भविष्य बहुत छोटा होता है। आज यह चारित्रिक पतन क्यों है? हमारा युवा मन टेलीविजन और सिनेमा से प्रभावित हो गया। अब वह उनका कॉकटेल बना रहा है।

सम्बन्ध प्रगाढ़, स्थायी और प्रेममय होता है। ये गर्मी दूर करने और विडिओ बनाने वाले, टाइम पास करने वाले नायक – नायिका भविष्य देख कर बाइंडिंग नहीं किये हैं बल्कि यहां तो स्वार्थ और पैसा है। आज वाले लव में नायिका अपने नायक से तरह – तरह के उपहार चाहती है, विश्वास और प्रेम से उसका कोई सरोकार नहीं है। वह कहती है कि जब तक मन हुआ हम – तुम मजे लिए अब मेरा मन तुम पर नहीं लगता। अब तो मैं पप्पू से प्यार करती हूँ। लड़का : मुझे क्यों छोड़ा? मैं तुम्हें वाइफ बनना चाहता था, मैं तुम पर कितना पैसा और समय बर्बाद किया। तुम ऐसा मेरे साथ कैसे कर सकती हो? लड़की : मैं भी कोई तुम्हारी पहली नहीं थी, मुझसे पहले और बाद और भी रहेंगी, आजकल के लौंडो को मैं अच्छे से जानती हूं। मैं नहीं तो कोई और सही।

अब रिश्ते लिव-इन-रिलेशनशिप वाले हो गये हैं। जब तक अच्छा लगे बिना विवाह किए एक घर में पति – पत्नी की तरह रहें। किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं। फिर तुम अपने रास्ते और हम अपने।

प्रेमी – प्रेमिका और पति – पत्नियों की अदला – बदली अमेरिकी – यूरो संस्कृति के प्रभाव से रिश्तों में पशुता आ जा रही है। माया नगरी के सिने-कलाकार की तरह मेरी बीबी सिर्फ मेरी नहीं है, वह तब तक ही है जब तक वह चाहे।

भारतीय संस्कृति में प्रेम में, रिश्तों में पशुता और नीचता नहीं रही है। रिश्ते का मतलब है ‘विश्वास’, रिश्ता मतलब ‘प्रेम’, रिश्ता मतलब ‘आदर्श’, रिश्ता मतलब ‘एकत्व की भावना’ और रिश्ता मतलब ‘संस्कार’ है। लेकिन आज यही रिश्ता मजाक बन गया है।

अंग्रेजी शिक्षा अंग्रेजी संस्कार को हमारे समाज में रोप रही है। पति – पत्नी का रिश्ता अभिन्न था। प्रेमी – प्रेयसी की कितनी कहानियां रही हैं जिसका मन से वरण कर लिया वही तन से वर हो जाता था। नल दमयन्ती की प्रेम गाथा, दुष्यन्त – शकुंतला की प्रेम गाथा अजर – अमर है।

महाभारत में वर्णन है कि जब जुए में अपना सब कुछ हार कर नल रात्रि के समय में एक सराय में दमयन्ती को छोड़ कर चले जाते हैं तब दमयन्ती नदी से, पहाड़ से, पेड़ से, जंगली पशुओं से और चिड़ियों आदि से कहती है तुम मेरे नल को देखे हो, मैं उनके बिना जीवित न रहूंगी।

जब माता सीता का हरण हो जाता है तब श्रीराम उन्हें खोजने के लिए जाते हैं तो ऐसा ही कहते हैं :

हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी।
तुम्ह देखी सीता मृगनैनी॥

श्रीराम अपनी “श्री” के लिए व्याकुल दिखते हैं। क्या यह प्रेम तुम्हें नहीं दिखा जो वैलेंटाइन में तुम प्रेम की तलाश करने लगे? प्रेम का भारतीय ग्रंथों में अद्भुत वर्णन है जिसे आज के युवाओं को पढ़ना चाहिए जिन्होनें प्रेम को बदनाम कर दिया है। प्यार पूरे जीवन एक से होता है हां, लगाव कई लोगों से होता है।

“प्रेम गली अति सांकरी, जा में दो न समाय !!”

चरित्र के लिए हिटलर कहता है कि चरित्रहीन व्यक्ति समाज में वायरस की तरह है, वायरस समाज में उसी से फैलता जाता है इस लिए चरित्रहीन को गोली मार देनी चाहिये। ‘चरित्र’ से आप पता नहीं कहाँ तक सहमत है।

स्त्री पुरुष में रिश्ता मित्र का हो ही नहीं सकता है, बारूद और माचिस में मित्रता कैसी? रिश्तों को घुमाया न जाय बल्कि वास्तविकता में जिन्होंने ने अनुभव लिया, उनसे पूछ कर देखा जाए। स्त्री-पुरुष सम्बन्ध पिछले 5000 वर्षों में सबसे निम्न स्तर के दौर से गुजर रहा है। भारत की भूमि चरित्र को बहुत महत्व देती रही है जिसको मन, वचन से पति/पत्नी मान लिया वही कर्म से भी होता है।

कौशिक और कौशिकी की कथा में जब कौशिकी के पिता कौशिक के साथ कौशिकी का विवाह निश्चित कर देते हैं और कुछ दिन बाद कौशिक को कुष्ठ रोग हो जाता है तो वह विवाह के लिए मना कर देते हैं। कौशिकी अपने पिता को लेकर कौशिक के पिता गाधि के आश्रम में जाती है, उनसे कहती है यह बीमारी विवाह के पश्चात होती तो क्या मैं इनका परित्याग कर देती? नहीं! मैंने मन वचन से इन्हें पति मान लिया है, यह बंधन सात जन्मों का है जो मेरे भाग्य में है वही होगा। आगे कहती है कि : “पति पत्नी वह रथ के पहिये हैं जिसपर सृष्टि घूमती है। मैने आप को मन से, वचन से पति मान लिया मैं दूसरे का वरण नहीं कर सकती।”

आज कौशिक – कौशिकी, नल – दमयन्ती, दुष्यंत – शकुंतला, राम – सीता की भूमि पर प्रेम, विश्वास और रिश्तों का अभाव है। रिश्तों की उखड़ती डोर। चिंता हमें भारतीय संस्कृति की है जिसका आचरण युवा पीढ़ी में नहीं दिखता है। यह 2020 – 2030 का दशक बहुत कठिन है, इसमें जिस तरह से समाज में आदर्श रोपेंगे वह 2090 तक चलने वाला है। इस कारण बहुत सावधानी से कदम उठाने की जरूरत है।

चरित्र, संस्कार, मर्यादा और अनुशासन बीते युग की बातें होनी लगी हैं। हमारे घर में, हमारी सोच में अपसंस्कृति का प्रवेश, जिससे हमारा मन विश्रृंखलित हो गया है। दूसरे के प्रभाव में कुछ दूसरा कर रहे। ‘एको ही नारी सुंदरी या दरीवा’ कही गयी है, पति को देव तुल्य माना गया है। विवाह के समय पत्नी अपने पति से सात वचन लेती है और एक वचन देती है। एको नारी व्रत:। एको पति व्रत: कहा गया है। यह डोर प्रेम भरे विश्वास की है, अभिन्नता, एकात्म के अनुभति की है।

अपने सतीत्व की शक्ति से माता अनुसूइया ने ब्रह्म, विष्णु और महेश को बालक बना दिया। भगवान परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि के कहने पर अपनी माता रेणुका का वध का उनकी अशक्ति (चरित्र) डिग जाने की वजह से कर दिया। चरित्र का बल सबसे बड़ा बल। उच्छृंखल होकर देहभोग की वासना सुख नहीं देगी बल्कि अहंकार और भ्रम पैदा करेगी, जीवन पत्नी और पुत्री पर शंका में बीतेगा।

मनुष्य के रूप में एक पुरुष को एक स्त्री संग का अधिकार है, यही बात नारी पर भी लागू होती है। भौतिक भोगों से कामनाओं की तृप्ति नहीं होती है। उससे शरीर जर्जर और कामी हो जाते है। हमारे शास्त्रों में कहा गया धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष! जिसमें अर्थ और काम का सेवन धर्मानुसार होना चाहिए। वह धर्म से नियंत्रित रहे तभी वह उत्तम है अन्यथा व्यसन बन जाता है।

प्रेम सह्रदय, कोमलता, एकत्व का बोध करता है। स्त्री – पुरुष के भेद को दूर कर देता है। प्रेमी – प्रेयसी एक हो जाते हैं और वह जीवन से लेकर मृत्यु तक अभिन्न ही रहते हैं।

रूठे सुजन मनाइये जो रूठे सौ बार।
रहिमन फिरि फिरि पोइए टूटे मुक्ता हार।।


नोट: प्रस्तुत लेख, लेखक के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो।

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Diwakar Sharma
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1 year ago

अति सुंदर।

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