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Monday, December 6, 2021

कृषक कानून और बदहाल किसान

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Dhananjay Gangay
Dhananjay Gangay
Journalist, Thinker, Motivational speaker, Writer, Astrologer🚩🚩
पढने में समय: 3 मिनट

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार होकर भी बदहाल कैसे हो सकती है?

क्या किसान अब अर्थव्यवस्था पर बोझ बन गया है?

सरकार द्वारा चुनाव के दबाव में कदम वापस खींचे गए। सरकार द्वारा वापस लिए गये तीन कानून –

  1. कृषक उपज व्यापार, वाणिज्य संवर्धन और सरलीकरण विधेयक (2020) : यह कानून निकट भविष्य में सरकारी मंडियों की प्रासंगिकता को शून्य कर देगा। निजी क्षेत्र को बिना पंजीकरण और बिना किसी जबाबदेही के कृषक उपज के क्रय-विक्रय की खुली छूट। जिससे अधिक से अधिक कृषि उपज की खरीदारी निजी क्षेत्र करें।
  2. कृषक कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक (2020) : इसी के तहत कांट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा। बड़ी कम्पनियों और भारी भरकम मशीनीकृत खेती के सामने भूमिहीन, संसाधनहीन किसान कैसे टिकेगा?
  3. आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक (2020) : निजी क्षेत्र को असीमित भंडारण की छूट। उपज जमा करने के लिए निजी निवेश की छूट। यह एक प्रकार से जमाखोरी और कालाबाजारी को ही मान्यता देना है।

2011 की जनगणना के अनुसार देश में कुल 26.33 करोड़ परिवार खेती किसानी के कार्य में लगे हुये हैं। इसमें से महज 11.9 करोड़ किसान के पास खुद की जमीन है जबकि 14.43 करोड़ किसान भूमिहीन हैं। भूमिहीन किसान बड़ी संख्या में बटाई या अधिया पर ली गई भूमि पर खेती करते हैं जिसमें भूमि के मालिक को उसकी भूमि पर खेती के बदले आधा उपज दिया जाता है। श्रम और भूमि से मिलकर उपज पर आधा-आधा बटवारा।

भारत की GDP में कृषि का हिस्सा 14 फीसदी है; वहीं इस पर आश्रित जन कुल जनसंख्या के 50 फीसदी हैं।

किसान की सबसे बड़ी समस्या है उसका असंगठित होना। नेता भी जानते हैं कि किसान अपने हक के लिए कभी इकट्ठा नहीं होगा। इस कारण उसके हितों के कानून कभी पास नहीं किये जाते। अलबत्ता यह जरूर है कि उसे खेती से हतोत्साहित करने के कानून बनाये जाते हैं।

बिजनेसमैन कार्टेल बना कर अपने उत्पाद का मूल्य बढ़ा लेता है तो वहीं किसान को सरकार द्वारा घोषित MSP (Minimum Support Prices या न्यूनतम समर्थन मूल्य) के इर्द गिर्द रहना पड़ता है।

MSP की व्यवस्था भी ऐसी है कि सामान्य किसान की पहुँच से दूर रहती है। जैसे उत्तर प्रदेश में धान की कटाई अक्टूबर के अंत तक शुरू हो जाती है जबकि MSP पर खरीद दिसम्बर में शुरू होती है। उसमें भी कभी कहा जाता है कि हाइब्रिड धान नहीं लिया जायेगा, सिर्फ मंसूरी लिया जायेगा और कभी केवल हाइब्रिड ही लिया जायेगा। अब जिन किसानों ने उस धान की फसल नहीं बोई है, उसका क्या हो? या तो पहले से इस बात की जानकारी दी जाए। धान की MSP पर खरीद मात्र एक या ज्यादा से ज्यादा डेढ़ महीने तक होती है। यही आलम गेंहू का भी है।

MSP को पूरे फसल सत्र के लिए क्यों लागू नहीं किया जाता है? और उसमें सभी तरह के धान और गेहूं की छूट मिलनी चाहिए।

किसान अपने मूल्य का निर्धारण कब तक मंडी और सरकार से करवाता रहेगा? भारत द्वारा WTO में हस्ताक्षर करने के साथ स्पष्ट कर दिया गया था कि वह उद्योग और सेवा क्षेत्र को बढ़ावा देगा और प्राथमिक क्षेत्र कृषि को हतोत्साहित करेगा।

सरकारें कृषि नीति में सुधार की जगह मुफ्त बाटने में लगी हैं। यह मुफ्त ही उसे वोट दिलायेगा, कृषि सुधार नहीं; जनता के व्यवहार ने भी यही सिद्ध किया है।

किसान के 2 एकड़ खेत का मूल्य 2 करोड़ रुपये हो सकता है किंतु इससे उसका जीवन नहीं चल सकता। जबकि एक चपरासी 5 लाख घूस देकर खुशहाल जीवन के साथ प्रॉपर्टी बना लेता है।

किसान विवश और मजबूर है; उसकी सुनवाई कही नहीं है। उत्तर प्रदेश में इस समय किसान की मेहनत का आधा तो छुट्टे जानवर खा जा रहे हैं, छुट्टे जानवरों की कोई व्यवस्था नहीं है, बस घोषणा जरूर की जाती है।

आप की राजनीति पक्ष-विपक्ष, राष्ट्रवादी-सेकुलर की हो सकती है लेकिन किसान वास्तव में दुःखी है, उसकी उपज का सही मूल्य उसे नहीं मिल रहा है। 5 एकड़ की खेती वाला किसान भी अपने किसानी की आय से गुजारा नहीं कर पा रहा है तो वहीं एक छोटी नौकरी वाला या छोटे व्यापार वाला अपेक्षाकृत खुश है। यह अंतर आखिर किसने पैदा किया?

उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान। कभी उत्तम कही जाने वाली कृषि आज चाकरी वाले से ही भीख मांगने पर मजबूर है उसे उर्वरक की बदहाली से लेकर बीज और बिजली के लिए भी तरसना पड़ता है।

अस्वीकरण: प्रस्तुत लेख, लेखक के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो। उपयोग की गई चित्र/चित्रों की जिम्मेदारी भी लेखक स्वयं वहन करता है।
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