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Tuesday, June 28, 2022

गुरु – शिष्य परम्परा

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Dhananjay Gangey
Dhananjay gangey
Journalist, Thinker, Motivational speaker, Writer, Astrologer🚩🚩
पढने में समय: 3 मिनट

प्राचीन भारतीय समाज में गुरु को अत्यंत आदरपूर्वक स्थान दिया गया था। गुरु को देवता माना जाता था। गुरु – शिष्य सम्बन्ध अत्यंत मधुर एवं सौहार्दपूर्ण थे।

प्राचीन युग में सार्वजनिक शिक्षण संस्थायें, जहाँ प्रबंध समिति द्वारा नियुक्त अध्यापक शिक्षण कार्य करते थे, बहुत कम थे। अधिकतर ख्यातिप्राप्त आचार्य अपने निजी शिक्षण केंद्र स्थापित करके विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करते थे। इसमें आचार्य तथा उनके विद्यार्थियों के बीच सीधा सम्बन्ध होता था।

विद्यार्थी योग्य आचार्य के पास शिक्षा ग्रहण करने के लिए जाते थे तथा आचार्य भी सच्चे जिज्ञासु विद्यार्थियों को ही अपना शिष्य बनाते थे।

गुरु गृह पढ़न गये रघुराई।
अल्प काल विद्या सब पाई।।

शिष्य गुरु के घर पुत्र की तरह रह कर शिक्षा पाता था। निरुक्त में कहा गया है कि शिष्य अपने आचार्य को पिता और माता के समान समझे तथा उसके प्रति कभी द्वेष न करे।

तं मन्येत पितरं मातरं च तस्मै न दुह्रोत्कतमच्चनाह

मनुस्मृति में कहा गया है कि उपनयन संस्कार के बाद विद्यार्थी का दूसरा जन्म होता है और गायत्री उसकी माता तथा आचार्य उसका पिता होता है। शिष्य को अपना लेने के बाद गुरु उससे शुल्क नहीं लेता था बल्कि स्वयं भोजन, वस्त्रादि देकर उसकी सहायता करता था।

शिष्य गुरु के लिए भिक्षा मांगता तथा उनकी आज्ञाओं का पालन करता था। गृह कार्यों में उनकी सहायता किया करता था। वह गुरु की निंदा न कर सकता था न सुन सकता था।

आपस्तम्ब का मत है कि गुरु की त्रुटियों को शिष्य एकांत में उसे बताये। ऋषि गौतम ने व्यवस्था दी है कि धर्मविहीन गुरु की आज्ञा मानने से शिष्य इनकार भी कर सकता है।

शिष्य का गुरु और गुरुमाता की सेवा शुश्रुषा करना पुनीत कर्तव्य माना गया है। वह गुरु के निमित्त जल, दातून, आसन, समिधा, घर की सफाई तथा गायों की सेवा करता था। मनु के अनुसार शुश्रूषा से ही विद्या की प्राप्ति होती है। शिष्य प्रायः एक आचार्य को छोड़कर दूसरे के यहाँ नहीं जाता था। पतंजलि ने ऐसे शिष्यों को “तीर्थकाक” बताया है।

गुरु अपने सभी शिष्यों में समभाव रखता था, राज कुमार – रंक कुमार गुरुकुल में एकसाथ शिक्षा लेते थे। विद्यार्थी गुरुकुल के नियमों का पालन करते थे। उन्हें कठोर अनुशासन में रहना पड़ता था, अनुशासनहीन एवं उदण्ड विद्यार्थी को आचार्य कठोर दंड देते थे। जातक ग्रंथो से पता चलता है कि उदण्ड शिष्य को शारीरिक दंड भी दिया जाता था।

समावर्तन संस्कार के पश्चात शिष्य गुरु गृह से वापस आता था। समावर्तन संस्कार के समय ही गुरु शिष्य को स्वाध्याय का क्रम जारी रखने को कहता था। कालिदास ने जो धन लालसा से शिक्षा प्रदान करते थे उन्हें ज्ञान का व्यवसायी कहा है। समाज उन्हें निंदा की दृष्टि से देखता था।

स्पष्ट है कि भारत में शिक्षा और शिक्षक दोनों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त रहा है। इससे व्यक्ति एवं राष्ट्र दोनों का चरित्र निर्मित होता था। अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति को कमजोर करने के लिए गुरु परम्परा पर प्रहार किया। शिक्षा का व्यवसायीकरण कर चारित्रिक पतन को समाहित किया गया। आज शिक्षा संस्कार न होकर व्यापार हो गयी है, शिक्षण संस्थान उद्योग बन गए हैं। लाखों – करोड़ों रुपये बनाये जा रहे हैं।

अब आप विचार करिये कि ऐसा उद्योग संस्कार देगा या स्वयं लाभ कमायेगा। व्यक्ति में नैतिक पतन, चारित्रिक दुर्बलता आम हो चुकी है क्योंकि शिक्षा लाभ – हानि के गणित में उलझ गयी है। यह आज सबसे बड़े लाभ के व्यापार में शामिल हो चुकी है।

प्राचीन शिक्षा व्यवस्था के कारण ही भारत में 64 प्रकार के व्यवसाय थे। भारत का व्यापार विश्व के GDP का 35% तक पहुँचा था जो आज 2% पहुँचने में रेंग रहा है। भारत सभी क्षेत्रों में शीर्षस्थ था।

आज शिक्षा भी विदेशों से आयात कर लोग अपने ही लोगों को ठग रहे हैं, मानसिकता दूषित है। छोटी – छोटी बच्चियों के साथ दरिंदगी हो रही है। जो रोजगार के दावे थे सब खोखले साबित हुए।


नोट: प्रस्तुत लेख, लेखक के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो।

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अस्वीकरण: प्रस्तुत लेख, लेखक/लेखिका के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो। उपयोग की गई चित्र/चित्रों की जिम्मेदारी भी लेखक/लेखिका स्वयं वहन करते/करती हैं।
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