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Saturday, December 3, 2022

लोकतंत्र की कहानी

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Dhananjay Gangey
Dhananjay gangey
Journalist, Thinker, Motivational speaker, Writer, Astrologer🚩🚩
पढने में समय: 3 मिनट

एक बार जंगल में मीटिंग हुई जिसमें सवर्मत से निर्णय लिया गया कि समता और समानता मूलक शासन की स्थापना हो, सभी को अवसर मिले और रोटेशन प्रणाली को लागू किया जाय। अर्थात शेर के बाद घोड़ा, हाथी, भेड़, बकरी, सुअर, सियार, लोमड़ी आदि भी राजा बन सकें।

सब में बड़ी खुशी थी कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होगी और अपनी जाति वाला राजा बन सकेगा। कुछ दिन बाद देखा क्या गया कि जब लोमड़ी राजा बना तो सभी महत्वपूर्ण पद लोमड़ी को दिया, जब सियार राजा हुआ तो महत्वपूर्ण पद सियार को मिला। योग्यता को दरकिनार कर दिया गया। वैमनस्यता आधारित शासन हो गया। जब जिसका राजा बनता अपने जाति वाले को ला कर बसा देता।

लोग सामान्य कार्य के लिए भी भष्ट्राचार का सहारा और आगे अपनी जाति के शासक बनने का हवाला देने लगे। धीरे – धीरे जंगल में घुसपैठियों की समस्या बढ़ती गयी। लेकिन अब बहुमत के आधार पर शासक का निर्णय होना भी बीच में तय कर लिया गया। सबसे कम जनसंख्या शेर की थी इसलिए वह स्वयं लोकतंत्र के चक्कर में शासन से दूर हो गया किन्तु उससे अराजकता नहीं देखी जाती, वह जंगल को लेकर चिंतित रहता था।

एक दिन जब वोट के आधार पर लोमड़ी का शासन चल रहा था उसी समय जंगल पर जंगली भैसों का आक्रमण हुआ लोमड़ी के शासन में चौथी पीढ़ी थी। इस समय जो लोमड़ी थी वह बिल्कुल अयोग्य थी किन्तु उसके शासन की आदत और संख्या में अधिक होने के कारण वह सत्ता में थी।

लोमड़ी ने अपने कुनबे को बचाने के एवज में सत्ता भैसों को सौंपने का निर्णय किया। इस समय जंगल में अवैध जानवरों की संख्या काफी बढ़ गयी थी। जो वोट के समय एक बड़े फैक्टर का काम करती थी। उन्होंने नव आयातित भैसों की तरफ झुकाव किया जिससें उनकी स्वीकार्यता बढ़े और शासन में पद भी मिल सके।

धीरे – धीरे वहाँ के कानून परिवर्तित होने लगे। लोभ और लालच चरम पर पहुँच गया, अनुशासन जाता रहा। अब लोकतंत्र था जिसकी संख्या बढ़ती वह सत्ता ले लेता। बड़ी जातियों में भी संख्या बढ़ाने की होड़ मच गई। योग्य सिर्फ चिंता करते और चुप रहते क्योंकि गधों को न्याय व्यवस्था, भेड़िए के हिस्से पुलिस व्यवस्था थी। सत्ता, जनसंख्या और जाति निर्धारित करने लगी थी।
शेर और उसका प्रधानमंत्री हाथी तीर्थ यात्रा के बहाने उस जंगल को छोड़ कर चले गये। अब तो सुना है कौवे को रक्षा मंत्री और उल्लू को संचार का पद मिला है। लोकतंत्र में शेर और हाथी का क्या काम जब गधा हुआ पहलवान।

जंगल में आपराधिक गतिविधियों के साथ जानवरों के गायब होने का सिलसिला शुरू है। रोज मुकदमें होते हैं, न्याय की ढकोसलेबाजी चलती है। पीड़ित के पास धन नहीं है तो न्याय वहीं दम तोड़ देता है। लोकतंत्र का भेड़चाल जातिवाद और राजनीतिक वंशवाद का रूप धर अपने को ठग रहा है किन्तु अयोग्यता को बढ़ाने की जिम्मेदारी सब पर है, विचार का अभाव अराजकता में फंसा देता है।

आज, एक तरफ हम CAA की बात कर रहे हैं, 377 हटा रहे हैं, विवाहेत्तर सम्बन्ध को वैध करके लैस्बियन, ट्रांसजेंडर को अधिकार दे रहे हैं तो दूसरी तरफ निर्भया और हैदराबाद रेप और मर्डर की जिम्मेदारी से पीछा छुड़ा रहे हैं। जंगल का कानून, मैंने चूड़ियां नहीं पहनी है और समाज की नपुंसकता जैसे स्लोगन ओछे हैं। सिर्फ भेड़चाल है, सत्ता मिलने की और पद कुनबे को देने की, बाकी चलता आया है और चलता रहेगा।

बच्चे मरेंगे, किसान आत्महत्या करेंगे, नारी का रेप होगा, संगठित अपराध जारी रहेगा और सबसे बड़ी बात देश को गाली दीजाएगी, तिरंगे और राष्ट्रगान का अपमान होगा क्योंकि यही शासन है, जहां संवेदना से अधिक वोट और सत्ता महत्वपूर्ण है।


नोट: प्रस्तुत लेख, लेखक के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो।

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अस्वीकरण: प्रस्तुत लेख, लेखक/लेखिका के निजी विचार हैं, यह आवश्यक नहीं कि संभाषण टीम इससे सहमत हो। उपयोग की गई चित्र/चित्रों की जिम्मेदारी भी लेखक/लेखिका स्वयं वहन करते/करती हैं।
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