भगवान और सांइस में आस्था

भगवान और सांइस में आस्था

मजा और ज्ञान… बस अंत तक जरूर पढ़ें। एक छोटे से दुकान का मालिक, अपने दुकान के एक कोने में कन्हैया जी की एक छोटा सी तस्वीर लगा रखी थी। रोज सुबह उस तस्वीर को पोछ कर हाथ जोड़कर, उनके…

काशी बोल रहा है

काशी बोल रहा है

भारत की राजनीति में मोदी से पूर्व का भारत और पश्चात के भारत पर हम सभी विस्तार से कभी और चिंतन करेंगे, आज थोड़ी झलक। मोदी से पूर्व के भारत के नेता सेकुलर थे। फिल्मकार, पत्रकार, अध्यापक, इतिहासकार और लेखक…

माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः

माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः

“माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः पर्जन्यः पिता स उ नः पिपर्तु॥” अर्थ है यह भूमि (पृथ्वी) हमारी माता है और हम सब इसके पुत्र हैं। ‘पर्जन्य’ अर्थात मेघ हमारे पिता हैं। और ये दोनों मिल कर हमारा ‘पिपर्तु’ अर्थात पालन…

भारतीय दर्शन की उत्पत्ति

भारतीय दर्शन की उत्पत्ति

भारतीय विचार धारा चाहे आस्तिक हो या नास्तिक, उसकी उत्पत्ति दुःखानुभूति या आध्यात्मिक असंतोष से हुई है। भारतीय दार्शनिकों ने अपने तात्विक विवेचन में जीवन को दुःखमय माना है। विश्व की घटनाओं एवं वस्तुओं और जीवन को स्वभावतः दुखात्मक पाया…

सनातन धर्म में ग्रन्थों को लिखने-पढ़ने का क्या प्रयोजन है?

सनातन धर्म में ग्रन्थों को लिखने-पढ़ने का क्या प्रयोजन है?

वैदिक सनातन धर्म के जनक ‘वेद’ हैं अर्थात वेद ही मूल धर्मग्रंथ हैं। वेद चार हैं – १. ऋग्वेद २. यजुर्वेद ३. सामवेद और ४. अथर्ववेद। वेदों के आधार पर ही, और उन्हें समझाने के उद्देश्य से बाकी के सभी…

वास्तविक शिक्षा

वास्तविक शिक्षा

वास्तविक शिक्षा वही है जिसे आपने अपने जीवन में उतारा हो। जिन अच्छी बातों की जानकारी हो या जिन अच्छी बातों को आप जानते हों, उससे कोई लाभ नहीं है जैसे औषधि को रखने, देखने या जानने से कोई लाभ नहीं, लाभ तभी है जब आप उसका सेवन करें।

आर्ष ग्रन्थ और भारतीय दर्शन

आर्ष ग्रन्थ और भारतीय दर्शन

प्राचीन भारतीय ग्रंथों (वेद, उपनिषद आदि) में जो ज्ञान, विज्ञान आदि जानकारियाँ मिलती हैं वह इतनी सटीक हैं कि यह कहना गलत न होगा कि मनुष्य किसी भी काल में अपने ज्ञान का विस्तार, किसी भी दिशा या क्षेत्र में…

पुराणों की सत्यता

पुराणों की सत्यता

इतिहास ग्रंथों को लिखने का प्रयोजन यह है कि हम उन्हें जाने, उनसे सीख ले सकें, लेकिन सीख लेने को छोड़ कर बाकी सब कुछ करने के लिए हम तैयार रहते हैं, हम उनकी सत्यता का, काल का पता लगाते हैं।

दर्शन और देखने में अंतर

दर्शन और देखने में अंतर

देखने का मतलब है, सामान्य देखना जो हम दिनभर कुछ ना कुछ देखते रहते हैं। किन्तु दर्शन का अर्थ होता है – जो हम देख रहे हैं 'उसके पीछे छुपे तथ्य और सत्य को जानना'। देखने से मनोरंजन हो सकता है, परिवर्तन नहीं। किन्तु दर्शन से मनोरंजन हो ना हो लेकिन परिवर्तन अवश्यम्भावी है।

क्या मूल्य है एक बार “राम” नाम जपने की?

क्या कीमत है एक बार “राम” नाम जपने की?

भगवान का नाम सुमिरन करने का महत्व इतना अधिक है कि एक बार भी यदि भगवान के नाम का सुमिरन सच्चे मन से किया जाये तो इसका मूल्य नहीं लगाया जा सकता।