दीपावली का दिन

प्रयागराज में मेरा एक छोटा सा गाँव है जहाँ हिन्दू के साथ बीस घर मुस्लिम के हैं। यहाँ के सभी मुसलमान दीपावली के दिन मोमबत्ती जलाते हैं, पटाखे भी छुड़ाते हैं। मेरे गाँव में कोई मस्जिद नहीं है। किसी मुस्लिम…

प्रयागराज में मेरा एक छोटा सा गाँव है जहाँ हिन्दू के साथ बीस घर मुस्लिम के हैं। यहाँ के सभी मुसलमान दीपावली के दिन मोमबत्ती जलाते हैं, पटाखे भी छुड़ाते हैं। मेरे गाँव में कोई मस्जिद नहीं है। किसी मुस्लिम…

आद्यशक्ति भगवती जगदम्बा ‘विद्या’ और ‘अविद्या’ – दोनों ही रूपों में विद्यमान हैं। अविद्यारूप में वे प्राणियों के मोह का कारण हैं तो विद्यारूप में मुक्ति की। भगवती जगदम्बा विद्या या महाविद्या के रूप में प्रतिष्ठित है और भगवान सदाशिव…

एक ही विचार भिन्न – भिन्न विचार के सांचे में जाने से खाँचे के आकार में ढल जाता है। मार्क्सवाद को ही ले लीजिए, कहीं चे ग्वेरा या लेनिन तो कहीं माओ वाद के साँचे में ढल गया। इस्लाम को…

वैज्ञानिक अविष्कार सिर्फ इन्द्रियों का विकास है आत्मा का नहीं जबकि सुख, प्रसन्नता शरीर का विषय नहीं है यह आत्मा का विषय है। मानवता का कल्याण मनुष्यता में है। अंग्रेजों ने अपनी उपनिवेशवादी आकांक्षाओं में दो विश्व युद्ध में करोड़ो…

मानवता मनुष्य का जन्मजात गुण है जो मनुष्य में सोचने और समझने की शक्ति के साथ ही विकसित होने लगती है। दया, करुणा, सहानुभूति – यह सभी मानवता के आयाम है, लेकिन केवल आयाम। मानवता का अर्थ इनसे कहीं अधिक…

प्रायः सम्पूर्ण भारतीय चिंतन-धारा का स्रोत ‘कर्मयोग’ ही है। और यही शाश्वत सत्य भी है। किसी भी विचारधारा का चिंतन, अनुशीलन तथा उसके मूल्यांकन की कसौटी ‘कर्मयोग’ है। यह शब्द जितना सरल और स्वत्वाक्षरी है, उतना ही भाव अर्थ गाम्भीर्ययुक्त…

कर्म यदि फलासक्ति भाव को त्याग कर भगवान को समर्पित कर अर्थात ‘भगवदर्थ’ किये जाएं तो वह ‘निष्काम कर्म’ कहलाते हैं और यह क्रिया ‘निष्काम कर्मयोग’ कही जाती है। भगवान श्री कृष्ण ने निष्काम कर्मयोग का विवेचन गीता के दूसरे,…

सप्तर्षियों का अवतरण से आगे … अलग – अलग मन्वन्तरों में सप्तर्षि बदल जाते हैं। मनुकाल ही मन्वन्तर कहलाता है। ब्रह्मा जी के एक दिन (कल्प) में चौदह मनु होते हैं। चौदह मनु तथा मनुपुत्र एक – एक कर समस्त…

“नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः।।” – मुण्डकोपनिषद ३/२/११ ‘परम् ऋषियों को नमस्कार है, परम् ऋषियों को नमस्कार है।’ सप्तर्षियों का प्रादुर्भाव श्री ब्रह्मा जी के मानस संकल्प से हुआ है। सृष्टि के विस्तार के लिए ब्रह्मा जी ने अपने ही समान…

सकलभुवनभूतभावनाभ्यां जननविनाशविहीनविग्रहाभ्यां । नरवरयुवतीवपुर्धराभ्यां सततमहं प्रणतोऽस्मि शंकराभ्याम् ॥ अर्थात, जो समस्त भुवनों के प्राणियों को उत्पन्न करने वाले हैं, जिनका विग्रह जन्म और मृत्यु से रहित है तथा जो श्रेष्ठ नर और सुंदर नारी (अर्धनारीश्वर) रूप में एक ही शरीर…